दलित वर्ग की शिक्षा
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जो आबादी की दृष्टि से द्वितीय श्रेणी में है वह कालेज शिक्षा की दृष्टि से चतुर्थ श्रेणी अर्थात् अंतिम श्रेणी में है, माध्यमिक शिक्षा की दृष्टि से अंतिम श्रेणी में और प्राथमिक शिक्षा की दृष्टि से भी अंतिम श्रेणी में है। मुसलमान जो आबादी की दृष्टि से तीसरी श्रेणी में हैं, वे कालिज शिक्षा की दृष्टि से द्वितीय श्रेणी, माध्यमिक शिक्षा की दृष्टि से द्वितीय श्रेणी और प्राथमिक शिक्षा की दृष्टि से द्वितीय श्रेणी में हैं, जब कि उन्नत हिन्दू जिन्हें आबादी की दृष्टि से चौथा स्थान प्राप्त है, उन्हें कालिज शिक्षा की दृष्टि से प्रथम स्थान, माध्यमिक शिक्षा की दृष्टि से प्रथम स्थान और प्राइमरी शिक्षा की दृष्टि से भी प्रथम स्थान प्राप्त है। इसके आधार पर हम निस्संकोच कह सकते हैं कि सापेक्षतः इस संबंध में 1882 की स्थिति की तुलना में कोई सुधार नहीं हुआ है।
- उपरोक्त विवरण से जो बंबई प्रेसिडेंसी के जन-शिक्षा निदेशक की 1923 - 24 की रिपोर्ट पर आधारित है, यही स्पष्ट होता है कि विभिन्न जातियों की शैक्षिक उन्नति में अंतर है। परन्तु जातियों के बीच शिक्षा में अंतर कोई बड़ी बात न होती, यदि यह
खाई बहुत गहरी न होती। जब तक हम विषमता के अंतर को न जान लें, तब तक हम किसी महत्वपूर्ण निश्चय पर नहीं पहुंच सकते। स्थिति को इस दृष्टि से स्पष्ट करने के लिए निम्नांकित सारणी प्रस्तुत है :
लोगों की श्रेणियां लोगों की माध्यमिक कालिज की
श्रेणी प्रति शिक्षा शिक्षा
एक हजार आबादी के आबादी के
छात्र अनुपात में अनुपात में
प्रति एक प्रति दो
लाख छात्र लाख छात्र
उन्नत हिन्दू 119 3000 1000 मुस्लिम 92 500 52 मध्य क्रम वर्ग 38 140 14 पिछड़ा वर्ग 18 14 शून्य और यदि हो
भी तो एकाध।
- उपरोक्त आंकड़ों से पता चलता है कि प्राथमिक, माध्यमिक और कालिज शिक्षा में प्रत्येक समुदाय दूसरों से कितना आगे है। इनसे पता चलता है कि इस प्रेसिडेंसी में विभिन्न जातियों के बीच कितना अलग - अलग अंतर है। इससे पता चलता है कि कुछ जातियों की स्थिति अत्यंत दयनीय है। उपरोक्त आंकड़ों से दो निर्विवाद तथ्य प्रकट होते हैं : (1) इस प्रेसिडेंसी में पिछड़े वर्गों की शिक्षा की स्थिति दयनीय है। आबादी की दृष्टि से उन्हें द्वितीय जैसा उच्च स्थान प्राप्त है, परन्तु शिक्षा के क्षेत्र में उन्हें ऐसा स्थान प्राप्त है जो न केवल अंतिम है, बल्कि न्यूनतम भी है और (2) प्रेसिडेंसी के