128 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
मुसलमानों ने शिक्षा के क्षेत्र में लम्बे - लम्बे डग भरे हैं, यहां तक कि 30 वर्ष की अल्प अवधि में उन्होंने न केवल मध्य क्रम तथा पिछड़े वर्ग जैसी अन्य जातियों को बहुत पीछे छोड़ दिया है, बल्कि वे ब्राह्मणों तथा संबंधित जातियों के निकट भी आ गए हैं।
- इसका क्या कारण हो सकता है? इस शाश्वत प्रश्न का फिर वही उत्तर है, सरकार के असमान व्यवहार की नीति। दो वर्गों के प्रति बर्ताव कितना असमान रहा है, वह शिक्षा की पंचवर्षीय रिपोर्ट के अंशों से प्रकट है। शिक्षा के क्षेत्र में मुसलमानों के साथ किए गए व्यवहार के बारे में तीसरी पंचवर्षीय रिपोर्ट (1892 - 96) में दिए गए विचार उल्लेखनीय हैं :
‘‘बंबई में मुस्लिमों की शिक्षा के आंकड़ों के संबंध में ख्. . ., निदेशक की टिप्पणी है कि
‘यदि परिस्थितियां प्रतिकूल न होती’ तो वृद्धि और अधिक होती। बंबई में बहुत
पहले ही समझ लिया गया है कि मुसलमानों ने आबादी के अन्य वर्गों की अपेक्षा
सार्वजनिक संस्थाओं का अधिक उपयोग किया ख्. . ., मुसलमानों की शिक्षा को प्रोत्साहन
देने के लिए क्या किया गया, इस आम प्रश्न पर निदेशक ने कहा हैः
‘पहली बात तो यह है कि हर जिले में डिप्टी या सहायक डिप्टी इंस्पेक्टर के रूप
में एक मुसलमान अधिकारी की नियुक्ति की गई है और हमारे यहां शोलापुर और
हैदराबाद में तीन स्नातक मुसलमान डिप्टी हैं, जब कि चौथे को राजस्व विभाग
में उच्च वेतनमान पर भेज दिया गया है। इस तरह एक भी जिला ऐसा नहीं है,
जहां की मुस्लिम आबादी से कर्मचारी वर्ग का सम्पर्क नहीं है। फिर बंबई, कराची
और जूनागढ़ (काठियावाड़ का मुस्लिम राज्य) में मुसलमानों के लिए हाई स्कूल
खोलने के लिए विशेष प्रयत्न किए गए हैं, जिनमें फीस कम है। अन्य अंजुमनों
ने अन्यत्र छोटे - छोटे स्कूल भी खोले हैं। कुछ क्षेत्रों में विभाग ने भी उनके हित
में विशेष स्तर रखे हैं और विशेष स्कूल खोले हैं और प्रांतीय तथा स्थानीय लोगों
की एक-तिहाई छात्रवृत्तियां उनके लिए आरक्षित रखी हैं। खान बहादुर काजी
शहाबुद्दीन (कभी बड़ौदा के दीवान थे) ने उनके लिए विशेष छात्रवृत्तियों की व्यवस्था
की और सिंध में खैरपुर के देशी राज्य के वारिस ने भोजन संबंधी कुछ छात्रवृत्तियां
आर्ट कालिज के छात्रों को दी हैं (मैंने बड़ी कठिनाईयों से इन्हें भरा है हालांकि
वे 25 रुपये प्रतिमास की है) फीस के मामले में प्राथमिक स्कूलों में मुसलमानों के
साथ बहुत उदारता बरती जाती है। उन्हें प्रशिक्षण कालिजों में बुलाने के लिए विशेष
नियम बनाए गए हैं और उनकी परीक्षा प्रणाली हिन्दुओं की अपेक्षा सरल है। बंबई
की संयुक्त स्कूल समिति ने काफी अर्से से मुसलमानों में शिक्षा को प्रोत्साहन देने
के लिए एक मुसलमान डिप्टी इंस्पेक्टर की नियुक्ति की [. . .] ’’
- दलित जातियों की शिक्षा के बारे में पांचवी पंचवर्षीय रिपोर्ट (1902 - 07) में व्यक्त विचारों की तुलना इससे करें :
959 बंबई ‘‘बंबई की सेन्ट्रल डिवीजन में छोटी जातियों के छात्रों को स्कूलों में निःशुल्क दाखिला दिया जाता है और उन्हें पुस्तकों, स्लेटों आदि के रूप में उपहार दिए