ख. दलित जातियों की शिक्षा - Page 147

130 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

  1. हंटर आयोग ने जो सिफारिशें की हैं, इनमें से प्रत्येक दलित जातियों के हित में भी आवश्यक थीं। परन्तु जब हम पिछड़ी जातियों के हितों में आयोग द्वारा की गई सिफारिशों का विश्लेषण करते हैं, तो वे ऐसे निदेश नहीं देतीं कि पिछड़ी जातियों की शिक्षा को सरकारी कोष पर वैध प्रभार माना जाए, छात्रवृत्तियां उनके लिए आरक्षित की जाएं, उनकी शिक्षा संबंधी आवश्यकताओं की देखरेख के लिए विशेष निरीक्षक रखे जाएं अथवा उनमें शिक्षा के प्रसार को बढ़ावा देते हुए उन्हें सार्वजनिक संरक्षण प्रदान किया जाए। आयोग ने तो मात्र इतना कहा है कि (1) इस सिद्धान्त की अब पुष्टि की जाए कि जाति के आधार पर किसी छात्र को स्कूल या कालिज में प्रवेश पाने से इंकार नहीं किया जाए और यह सिद्धान्त ऐसी प्रत्येक संस्था पर लागू किया जाए, जो विशेष जातियों के लिए आरक्षित नहीं हैं और जो सरकारी कोष, चाहे वह प्रांतीय हो, नगरपालिका का हो अथवा स्थानीय हो, से पूरी तरह चलाई जा रही हैं। (2) जिन क्षेत्रों में ऐसे छात्र पर्याप्त संख्या में हैं, जिनसे कि अलग स्कूल या कक्षाएं खोली जा सकें और जहां सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल उन्हें पर्याप्त शिक्षा नहीं देते हैं, वहां छोटी जातियों के बच्चों के लिए विशेष पृथक् स्कूल या कक्षाएं खोली जाएं। वास्तव में आयोग ने मुसलमानों के बारे में जो सिफारिशें की थीं, वे उनके बजाए पिछड़ी जातियों के हित साधन के लिए जरूरी थीं। चूंकि हंटर आयोग को भी, जिसकी अध्यक्षता ऐसा व्यक्ति कर रहा था, जिसके मन में मुसलमानों के प्रति प्रत्यक्ष सहानुभूति थी, स्वीकार करना पड़ा कि ‘‘1871 - 73 की जांच से यह सिद्ध हो गया है कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र के अलावा मुसलमानों के पिछड़ेपन को बढ़ा-चढ़ाकर बताने की प्रवृत्ति रही है।’’ इसके बावजूद हंटर आयोग ने जो सिफारिशें की हैं, वे वही दो हैं, जिनका उल्लेख किया गया है। दलितों को इन दोनों सिफारिशों से भी कोई विशेष लाभ नहीं मिलता। सिद्धांत की पुष्टि निरर्थक है, भले ही वह पांचवीं बार की गई हो। आयोग द्वारा लगाए गए परन्तुक के अंतर्गत इस सिद्धान्त को व्यवहार में नहीं लाया जाना था। इसी प्रकार दलित जातियों के लिए अलग से स्कूल खोलना भी संभव नहीं था। जिस सरकार के सामने प्राथमिक शिक्षा देने का कार्य है, उसके लिए अलग स्कूल खोलना संभव नहीं है, क्योंकि उसमें अतिरिक्त खर्च होगा। इसके अलावा यह परन्तुक कि ऐसे स्कूल उन स्थानों पर खोले जाएं, जहां पिछड़ी जातियां बहुतायत में हैं, सिफारिशों को नकारने के लिए पर्याप्त था। इसका सीधा सा कारण यह है कि देहातों में एक ही बस्ती में पिछड़ी जातियां मुश्किल से बड़ी संख्या में मिल सकती हैं।

  2. यह समझना मुश्किल है कि हंटर आयोग ने पिछड़ी जातियों की शिक्षा संबंधी आवश्यकताओं की ओर इतना नगण्य ध्यान क्यों दिया? यदि उसने मुसलमानों के प्रति उदारता को आवश्यक समझा था, तो उसे कम से कम यह तो देखना चाहिए था कि न्याय की दृष्टि से तो यह उदारता पिछड़ी जातियों के प्रति होनी चाहिए थी जो शिक्षा, धन और सामाजिक हैसियत में मुसलमानों से कहीं पीछे थीं। जब एक बार