दलित वर्ग की शिक्षा
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हंटर आयोग ने पिछड़ी जातियों को पृष्ठभूमि में धकेल दिया है, तो वे वहीं पर रहीं और सरकार ने उनकी ओर कभी कोई ध्यान नहीं दिया। इस उपेक्षा की मिसाल के तौर पर दिल्ली में भारत सरकार के शिक्षा विभाग के 21 फरवरी 1913 के संकल्प की ओर ध्यान दिलाया जा सकता है। भारत सरकार की ओर से अब तक जारी संकल्पों में यह सबसे महत्वपूर्ण था जिसमें उसने फैसला किया कि ‘‘कई प्रातों में शिक्षा की व्यापक प्रणालियों के प्रसार के लिए धन उपलब्ध होने पर सरकारी खजाने से भारी अनुदान देकर स्थानीय प्रशासनों की मदद की जाए’’। उस संकल्प में उन्होंने प्रांतीय सरकार को विशेष रूप से बताया कि ‘अधिवासी जाति’ तथा मुस्लिम जाति की शिक्षा संबंधी आवश्यकताएं क्या - क्या हैं? परंतु पूरे संकल्प में कहीं भी पिछड़ी जातियों का कोई उल्लेख नहीं है। बंबई सरकार ने झटपट सुझाव स्वीकार कर लिया और 1913 में मुसलमानों में शिक्षा के प्रसार के संबंध में सिफारिश करने वाली शिक्षा समिति में एक मुसलमान को शामिल कर लिया। सरकार की ऐसी आपराधिक उपेक्षा के प्रति कोई क्षोभ उचित ही होगा, खास तौर पर जब यह अनुभव किया जाए कि 1913 के बाद भारत सरकार ने, जो भारी अनुदान दिए थे, वे महामहिम सम्राट की उदार घोषणा को मूर्त रूप देने के लिए दिए गए थे। सम्राट ने यह घोषणा उस समय की थी, जब वह 6 जनवरी, 1912 को कलकत्ता विश्वविद्यालय के मानपत्र का उत्तर दे रहे थे। उन्होंने कहा था :
‘‘मेरी यह कामना है कि इस पूरे देश में स्कूलों और कालिजों का जाल बिछ
जाए जहां से वफादार साहसी और उपयोगी नागरिक बनकर निकलेंगे, जो उद्योग
और कृषि और जीवन के सभी क्षेत्रों में अपने बलबूते पर टिक सकेंगे। मेरी यह
भी कामना है कि मेरी भारतीय प्रजा के घरों में ज्ञान के प्रसार से प्रकाश फैले।
उस ज्ञान के फलस्वरूप चिन्तन, सुख - सुविधा, श्रम और स्वास्थ्य का एक उच्चतर
स्तर आए। शिक्षा के माध्यम से ही मेरी कामना फलेगी और फूलेगी और भारत में
शिक्षा का उद्देश्य मेरे हृदय का सबसे अति प्रिय धर्म होगा।’’
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- सुधार कानून 1921 से लागू हुआ। शिक्षा को एक मंत्री के अधीन हस्तांतरित कर दिया गया और स्वाभाविक रूप से उससे तीव्र विकास की अपेक्षा की गई। लेकिन दलित जातियों को इसमें संदेह था कि शिक्षा के विषय को मंत्रियों के हाथ में देने से उन्हें कोई लाभ होगा भी। इस मामले में वे नौकरशाही के हाथों काफी कष्ट उठा चुके थे। पहले चरण में तो नौकरशाहों ने शिक्षा का उन्हें लाभ उठाने ही नहीं दिया। दूसरे चरण में नौकरशाही ने उन्हें शिक्षा प्रदान करने में कोई सहायता नहीं की। इसके साथ ही नौकरशाही इस सिद्धान्त को नकारने में अति कुशल थी कि पिछड़ी जातियों को शिक्षा प्राप्त करने का कोई अधिकार है। पिछड़ी जातियां इतनी कुशल नहीं थी कि नौकरशाही का स्थान लेने के लिए संघर्षरत भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग से उसी कुशलता से अपने अधिकार का आग्रह कर सके। चूंकि भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग की जड़ें उस