132 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
अतीत में जमी हुई थीं, जिसमें पिछड़े वर्ग को कोई मान्य अधिकार नहीं थे। अतः पिछड़े वर्ग को आशंका थी कि वर्तमान में भी अतीत को पुनर्जीवित कर दिया जाए।
दुर्भाग्य से उनकी आशंकाएं सही साबित हुईं और यह कहना सही हो सकता है कि बंबई प्रेसिडेंसी में इन सुधारों के अधीन पिछड़ी जातियों की स्थिति बद से बदतर हो गई। मौजूदा हालात में यह एक अति कटु टिप्पणी लग सकती है लेकिन अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा अधिनियम (बंबई प्रेसिडेंसी अधिनियम संख्या 4, 1923) ने बंबई प्रेसिडेंसी के पिछड़े वर्गों के लिए जो स्थिति पैदा कर दी, उसे किसी अन्य प्रकार से व्यक्त नहीं किया जा सकता। अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा अधिनियम एक अति महत्वपूर्ण दृष्टि से पाखंड है। यह प्रणाली पहले की ही भांति स्वैच्छिक है और सदा ही वैसी ही बनी रहेगी, क्योंकि न तो उसे अनिवार्य बनाने के लिए कोई दायित्व डाला गया है और न ही उस दायित्व की पूर्ति के लिए कोई समय सीमा निर्धारित की गई है। इसके अलावा अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा अधिनियम ने प्राथमिक शिक्षा पर नियंत्रण के लिए प्रशासनिक तंत्र में अति अनाप-शनाप परिवर्तन कर दिए। अभी तक तो प्राथमिक शिक्षा का नियंत्रण तथा प्रबंधन प्रांतीय सरकार को सौंपा गया था और प्राथमिक शिक्षा के लिए सारा खर्च प्रातीय राजस्व से मिलता था, सिवाए स्थानीय बोर्डों के उस छोटे से अनुदान के जो कतिपय सुस्पष्ट स्रोतों से उनके राजस्व का एक-तिहाई होता था। अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा अधिनियम के अधीन स्थिति पलट गई है। अब स्कूलों का नियंत्रण और प्रबंधन जिला स्कूल बोर्डों को सौंप दिया गया है (जो स्थानीय जिला बोर्डों की समितियां हैं) और बजाए इसके कि स्थानीय बोर्ड प्रांतीय सरकार को अनुदान राशि दे उल्टे प्रांतीय सरकार से अपेक्षा की जाती है कि वह जिला स्कूल बोर्डों को अनुदान दे। इतनी निरंकुश भावना से यह परिवर्तन किया गया कि अधिनियम इन स्कूल बोर्डों को अपना निजी कार्यकारी अधिकारी नियुक्त करने का अधिकार देता है। ऐसा विशेषाधिकार तो बंबई नगरपालिका जैसे उन्नत निगम को भी नहीं दिया गया है।
सभा का विचार है कि यह परिवर्तन बहुत क्रांतिकारी है और निश्चय ही यह प्रेसिडेंसी के सर्वोत्तम हित विशेषतः पिछड़ी जातियों के हित के प्रतिकूल होगा। यह बात ध्यान में रखनी ही होगी कि शिक्षा की महती आवश्यकता को जनता के सभी वर्गों ने नहीं समझा है। आम धारणा यह है कि शिक्षा से सरोकार केवल ब्राह्मणों का ही है। केवल चंद लोग ही ऐसे हैं, जिन्होंने शिक्षा के प्रसार की राजनीति अपनाई है। स्कूल बोर्ड में तो ऐसे अनेक अनभिज्ञ ग्रामीण होंगे जो इस परम्परा में पले हों कि शिक्षा से तो केवल ब्राह्मणों का ही वास्ता है। अतः वे तो उसके प्रति उदासीन ही रहेंगे और उसे अनिवार्य बनाए जाने का विरोध ही करेंगे। यदि शिक्षा का कुशलता से संचालन करना है, तो इसे कुछ समय के लिए विधान परिषद् के सीधे नियंत्रण में प्रांतीय सरकार के पास ही रहने दिया जाए वहां कुछ ऐसे राजनेता होंगे जो शिक्षा की आवश्यकता को समझते होंगे। अतः शिक्षा का काम शिक्षा विभाग से लेकर स्कूल बोर्डों को सौंप देने