ख. दलित जातियों की शिक्षा - Page 150

दलित वर्ग की शिक्षा

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का अर्थ होगा कि उसे विश्वासपात्र क्षेत्रों से छीनकर अयोग्य हाथों में सौंप दिया गया है। यदि हस्तांतरण सामान्य रूप से शिक्षा की प्रगति में बाधक है, तो यह दलितों के लिए तो विशेष रूप से हानिकारक है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि भले ही इस बात में कुछ संदेह हो सकते हैं कि आम आदमी शिक्षा में विश्वास रखता है या नहीं, परंतु एक बात निश्चित है कि वह पिछड़े वर्गों को शिक्षित बनाने में विश्वास नहीं रखता। छोटी जातियों को प्राथमिक शिक्षा दिए जाने के बारे में ऊंची जातियों का जो रवैया है, उसके विषय में हंटर आयोग ने कहा है, ‘‘अनेक गवाहों ने बयान दिया है कि छोटी जातियों के बालकों को स्कूलों में दाखिला दिए जाने का स्पष्ट विरोध किया गया है। मद्रास के गवाह ने उस मामले का उल्लेख किया है जिसका संबंध कालीकट में प्राचीन दास जाति चेरुमांओं के लिए खोले जा रहे स्कूल से था, परन्तु नायर और तिया स्कूल के रास्ते में ही लड़कों के हाथों से उनकी पुस्तकें छीन लिया करते थे। इस विषय पर विचार - विमर्श के दौरान हमें बताया गया कि मध्य प्रांत और बंबई के कुछ भागों में ग्रामीण समुदाय ने छोटी जातियों की शिक्षा पर विशेष आपत्तियां इस आधार पर उठाईं कि शिक्षा से उनका जीवन उन्नत हो जाएगा और उन्हें प्रेरणा मिलेगी कि वे अपने वर्तमान दासता भरे जीवन से मुक्ति पाने का प्रयास करें। बंबई के जन-शिक्षा निदेशक ने अपनी 1896 - 97 की रिपोर्ट में एक मामले का उल्लेख किया है, जिसमें कैरा जिले के स्थानीय अधिकारियों ने इस कार्यवाही की अपेक्षा की कि छोटी जातियों के छात्रों को स्कूल में दाखिला दिया जाए। इसका फल यह हुआ कि पांच - छः बड़े - बड़े स्कूल वर्षों तक बंद पड़े रहे और एक गांव में तो छोटी जातियों के लोगों की झोंपडि़यां और फसलें जला दी गईं और दो वर्षों तक के लिए उस गांव पर भारी जुर्माना ठोक दिया गया।’’

  1. जब ग्रामीण समुदायों का ऐसा व्यवहार हो तो कैसे यह आशा की जा सकती है कि ऐसे स्कूल बोर्ड जिसमें अधिकांश ग्रामीण समुदायों के लोग होंगे, कैसे दलित जातियों की शिक्षा के मामले में अपने कर्तव्य का निष्ठा से पालन करेंगे? शिक्षा का नियंत्रण स्कूल बोडऱ्ों के हाथ में देने से वही स्थिति होगी जैसे अभियोक्ता को शासक बना दिया जाए। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि पिछड़ी जातियों ने स्कूल बोर्डों को प्राथमिक शिक्षा का नियंत्रण दिए जाने की निंदा करने वाले संकल्प पारित किए हैं। यदि दलित जातियों के प्रतिनिधियों को पर्याप्त संख्या में बोर्डों में रखा जाता तो कुछ राहत मिलती। पर ऐसी बात नहीं है। दलित जातियों को काउंसिल से लेकर स्थानीय बोर्डों तक के स्वशासी निकायों में प्रतिनिधित्व देने की योजना सरकार ने उस अभिभावक की तर्ज पर बनाई है जो नहीं चाहता कि उसके संग्रहालय में हर प्रजाति का एक से अधिक नमूना हो। सरकार स्थानीय जिला बोर्ड में दलित जातियों का एक ही प्रतिनिधि मनोनीत करती है जब कि कुल सदस्य 40 के करीब होते हैं और स्कूल बोडऱ्ों से कहा गया है कि वे दलित जाति के एक सदस्य को सहयोजित