138 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
बारे में कोई चर्चा नहीं की गई है। ना ही उसमें बताया गया है कि उनके लिए कितने मनोनयन की व्यवस्था हो। मताधिकार कमेटी की रिपोर्ट के पैरा 24 में मनोनयन वाली सीटों के प्रतिबंधों को ऐसे आधार पर उचित ठहराया गया है, जिससे यह पता नहीं चलता कि कमेटी दलित जातियों का उल्लेख कर रही थी। इस समुदाय के लिए उसने प्रतिनिधित्व का जो मापदंड रखा है, वह इस प्रकार है :
प्रांत कुल जनसंख्या दलित कुल दलित वर्गों के
(दस लाख में) वर्गों सीटें लिए
की जनसंख्या सीटें
(दस लाख में)
मद्रास 39.8 6.3 120 2
बंबई 19.5 0.6 113 1
बंगाल 45.0 9.9 127 1
संयुक्त प्रांत 47.0 10.1 120 1
पंजाब 19.5 1.7 85 -
बिहार तथा उड़ीसा 32.6 9.3 100 1
मध्य प्रांत 12.0 3.7 72 1
असम 6.0 0.3 54 -
कुल योग 221.4 41.9 791 7
‘‘ये आंकड़े स्वयं सबूत हैं। यह सुझाव दिया गया है कि ब्रिटिश भारत की पूरी आबादी के पांचवे हिस्से को लगभग 800 सीटों में से सात सीटें दी जाएं। यह सच है कि सभी परिषद्ों में लगभग छठा भाग अधिकारियों का ऐसा होगा, जिससे अपेक्षा की जाए कि वह दलितों के हितों को ध्यान में रखेगा परन्तु हमारे विचार में यह वह व्यवस्था नहीं है, जो सुधार संबंधी रिपोर्ट का लक्ष्य पा सके। रिपोर्ट तैयार करने वालों ने कहा है कि दलित जातियों को आत्मरक्षा का पाठ भी सीखना चाहिए। यह आशा करना निश्चय ही हास्यास्पद है कि एक ऐसी असेम्बली में जहां 60 से 90 तक सवर्ण हिन्दू हों, वहां दलितों का मात्र एक प्रतिनिधि शामिल करके वह परिणाम प्राप्त किया जाए। रिपोर्ट के पैरा 151, 152, 154 और 155 के सिद्धान्तों को सार्थक करने के लिए हमें अस्पृश्यों के साथ अधिक उदार व्यवहार करना ही होगा।’’
- सभा को इस बात की प्रसन्नता है कि अकेले उसकी ही यह राय नहीं है कि 1919 की सुधार योजना के निर्माताओं ने दलित जातियों के साथ अन्याय किया है। दो वर्ष बाद सुधारों की इस योजना में और सुधार तथा विस्तार की संभावना पर