दलित जातियों के हितों की रक्षा
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है, जिसकी पहले चर्चा की जा चुकी है कि किसी जाति की कुल संख्या दर्ज नहीं की गई है। लेकिन निकट स्वीकार्य विवरण (नीचे उद्धत) न्यूनतम संख्या का एक कच्चा अनुमान प्रस्तुत करता है, जिसे हिन्दू समाज का दलित वर्ग समझा जा सकता है। इन प्रांतीय आंकड़ों का कुल योग कोई पांच करोड़ तीस लाख बैठता है। लेकिन इसे भी एक कम तथा अनुदार अनुमान कहना पड़ेगा, क्योंकि इसमें न तो (1) संबधित जातियों और जन - जातियों की पूरी संख्या शामिल है और (2) न ही वे आदिम जातियां हैं, जो अभी हाल में हिन्दू धर्म में शामिल हो गई हैं और उनमें से अनेक को अशुद्ध माना जाता है। हम दावे से कह सकते हैं कि उन सभी दलित वर्गों की संख्या जिन्हें अशुद्ध माना जाता है, भारत में ही लगभग साढ़े पांच करोड़ से छ करोड़ के बीच है [. . .] ।’’
भारत में दलित वर्गों की संख्या
| n | fy | r |
|---|
| o | x |
|---|
| d | h |
|---|
प्रांत
योग 52680,000
असम 2000,000
बंगाल 9000,000
बिहार और उड़ीसा 8000,000
बंबई 2800,000
मध्य प्रांत और बरार 3300,000
मद्रास 6072,000
पंजाब 2893,000
संयुक्त प्रांत 9000,000
बड़ौदा 177,000
मध्य भारत 1140,000
ग्वालियर 500,000
हैदराबाद 2339,000
मैसूर 932,000
राजपूताना 2267,000
त्रावनकोर 1260,000
- जनगणना निदेशक का यह सुविचारित अनुमान भारत के विभिन्न प्रांतों में दलित वर्गों की संख्या के बारे में सभी अटकलों और अनुमानों को निरस्त कर देता है। इससे श्री वाजपेयी के अनुमान की वैधता समाप्त हो जाती है, क्योंकि यह अनुमान उन आंकड़ों की छानबीन करने के बाद लगाया गया है, जो प्रांतीय शिक्षा संबंधी रिपोर्टों में दिए गए हैं और जो श्री वाजपेयी के वक्तव्य का आधार हैं। वे रिपोर्ट की संख्या को निरख - परख कर तैयार किए गए हैं। इनकी सत्यता स्वीकार करनी होगी, क्योंकि