ग. दलित जातियों के हितों की रक्षा - Page 163

146 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

जैसा कि निदेशक ने कहा है कि यह अनुमान सोच समझ कर की गई जांच के बाद लगाया गया है। इसलिए सभा को सांविधिक आयोग से आग्रह करना चाहिए कि वह अन्य आंकड़ों की अपेक्षा इन आंकड़ों को स्वीकार करे। इस अनुमान के अनुसार बंबई प्रेसिडेंसी में दलित जातियों की कम से कम आबादी 2800,000 है, जो कुल जनसंख्या का 10.8 प्रतिशत बैठती है। सिर्फ उनकी जनसंख्या के आधार पर ही वे 140 में से 15 सीटों के हकदार हैं।

  1. यदि किसी जाति को प्रतिनिधित्व उसकी संख्या के अनुपात में ही दिया जाता है, तो दलित जातियों के लिए सात अतिरिक्त सीटों की मांग ऐसी प्रतीत होगी, जो उन्हें बिना परिश्रम किए ही मिल गई हैं। तथापि यह स्वीकार करना होगा कि इस प्रकार के मामलों को तय करने के लिए किसी जाति की केवल संख्या को ही आधार नहीं माना जा सकता। किसी जाति के लिए प्रतिनिधित्व का कोटा निर्धारित करते समय उस जाति की सामाजिक स्थिति को भी ध्यान में रखना होगा। जाति की स्थिति का अर्थ है कि उसके पास सामाजिक संघर्ष में आत्मरक्षा के लिए कितनी सामर्थ्य होनी चाहिए। यह सामर्थ्य जाति की शैक्षिक और आर्थिक स्थिति पर निर्भर करती है। इस सिद्धान्त को स्वीकार करने से यह निष्कर्ष निकलता है कि किसी जाति की सामाजिक स्थिति जितनी कमजोर होगी, उतना ही उसे दूसरी जातियों की अपेक्षा चुनाव में लाभ मिलना चाहिए। इसमें दो राय नहीं कि इस प्रेसिडेंसी में दलित जातियों की शैक्षिक और आर्थिक स्थिति सबसे खराब है। इसलिए अपनी संख्या के आधार पर चुनाव में जितने लाभ के वे हकदार हैं, उससे अधिक उन्हें मिलने चाहिए। उतनी ही संख्या और स्थिति वाली अन्य जातियों की तुलना में दलित जातियों को चुनाव में अधिक लाभ मिलना चाहिए, क्योंकि अन्य जातियां उतनी दलित नहीं हैं, जितनी कि दलित जातियां हैं। न ही किसी अन्य जाति को उतनी असुविधाओं का सामना करना पड़ता है, जितना दलित जातियों को, जो उन्हें अपनी वर्तमान अपमानजनक स्थिति से ऊपर नहीं उठने देती। इसी कारण सभा प्रतिनिधित्व में वृद्धि की मांग को उचित समझती है। एक और कारण भी है, जिसकी वजह से सभा सोचती है कि दलित जातियों के लिए मांगा गया अतिरिक्त प्रतिनिधित्व उचित है। अल्पसंख्यकों को यदि संरक्षण देना है, तो उनका प्रतिनिधित्व प्रभावशाली होना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता, तो यह मात्र एक नाटक होगा यदि यह नीति अपनाई जाती है, तो यह स्वीकार करना होगा कि यदि किसी अल्पसंख्यक समुदाय को संरक्षित रखना है, तो उसका पर्याप्त प्रतिनिधित्व होना चाहिए, ताकि उनकी आवाज दूसरों के आगे बिल्कुल दब न जाए। यदि इसी बात को एक प्रस्तावना के रूप में प्रस्तुत किया जाए तो कहा जा सकता है कि अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व का प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि वह इतना विशाल हो कि उस पर कोई दूसरा पूरी तरह हावी न हो सके। सभा का विचार है कि इस अतिरिक्त प्रतिनिधित्व की मांग यदि दलित जातियां करती हैं, तो वे