दलित जातियों के हितों की रक्षा
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इस बात की हकदार हैं कि देश के अन्य अल्पसंख्यकों के समान ही वे इस सिद्धान्त को अपने पक्ष में लागू करा सकें।
- सभी अल्पसंख्यक जातियों के प्रति निष्पक्ष व्यवहार की आवश्यकता : प्रतिनिधित्व की मात्रा को तय करने वाले ये सिद्धान्त हैं, जिन्हें भारत सरकार ने साउथबरो कमेटी की रिपोर्ट की समीक्षा करते समय अपने डिस्पैच में निर्धारित किया है। सभा यह बताना चाहती है कि समूचे भारत में किसी अन्य जाति की अपेक्षा दलित जातियों के मामले में इन सिद्धान्तों को लागू करना और अधिक उचित होगा। परन्तु व्यवहार में समूचे भारत में दलित जातियों को इन सिद्धान्तों के लाभ से नितान्त वंचित किया गया है। वस्तुतः यह लाभ मुसलमान जैसे संप्रदाय पर न्यौछावर कर दिया गया है, जो दलित जातियों की अपेक्षा देश में कहीं सशक्त और बेहतर स्थिति में है। असमान व्यवहार के एक ऐसे ही उदाहरण के संबंध में सभा आयोग का ध्यान दो निम्नलिखित मामलों की ओर दिलाना चाहेगी :
प्रांत मुसलमानों मुसलमानों दलित दलित
की संख्या की सीटें वर्गों की वर्गों
आबादी की
सीटें
मध्य प्रांत 574276 11 3060232 2
बंबई प्रेसिडेंसी 1207443 7 1627980 1
दलित जातियों के प्रति ऐसे अन्याय पर कोई कितना ही क्रुद्ध क्यों न हो जाए, भारत सरकार को तनिक भी लज्जा नहीं है, क्योंकि उसने खुल्लमखुल्ला इन सिद्धान्तों का प्रतिपादन एक अति सीमित उद्देश्य से किया है कि उन्हें केवल मुसलमानों पर लागू किया जाए। जैसा कि सर्वविदित है, उसका कारण यह था कि भारत सरकार ने विभिन्न जातियों के राजनीतिक महत्व के बारे में भेदभाव किया। सभा देश के नागरिकों का राजनीतिक महत्व के आधार पर श्रेणीकरण करने पर विराध्ध प्रकट करती है। इससे अधिक सुरक्षित और संरक्षित अन्य कोई नियम नहीं हो सकता है कि जातियों को राजनीतिक रूप से समान महत्व दिया जाए। यह द्वेषमूलक भेदभाव सभी सांप्रदायिक दंगों की जड़ है और समान अवसर के सिद्धान्त का हनन करता है। जब संसद ने सुधारों की पहली किस्त प्रदान की, उस समय भारत के प्रशासन में इस सिद्धान्त को लागू करना दलित वर्गों के हित के लिए घातक सिद्ध हुआ। सभा को प्रसन्नता है कि वर्तमान भारत मंत्री यह स्वीकार करते हैं कि दलित वर्गों की स्थिति ऐसी समस्या है जिस पर गंभीरता से विचार किया जाए और इस बारे में अब निर्णय लिया जा सकता है कि पहले लागू किए गए राजनीतिक सुधारों के