ग. दलित जातियों के हितों की रक्षा - Page 165

148 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

क्षेत्र को व्यापक बनाया जाए। लेकिन सभा को आशंका है कि ऐसी मान्यता का दलित जातियों के लिए कोई मूल्य नहीं होगा, यदि वह उन परिवर्तनों में परिलक्षित नहीं होते, जो देश के संविधान के ढांचे के बारे में अब लागू किए जाएं।

  1. प्रतिनिधित्व प्रणाली : सभा मनोनयन के सिद्धान्त का विरोध करती है और आग्रह करती है कि दलित जातियों के लिए निर्वाचन का सिद्धान्त लागू किया जाए। निर्वाचन न केवल उत्तरदायी सरकार की दृष्टि से सिद्धान्ततः ठीक है, बल्कि राजनीतिक शिक्षा की दृष्टि से व्यवहार रूप में आवश्यक है। हर जाति को राजनीतिक शिक्षा का अवसर मिलना ही चाहिए और उसे प्राप्त करने का अच्छा तरीका यही है कि मतदान का उपयोग किया जाए। इसे दुर्भाग्य नहीं तो और क्या कहा जाए कि किसी अन्य जाति की अपेक्षा जिन दलित वर्गों को ऐसी शिक्षा की अधिक जरुरत है, उन्हें ही इस बात का अवसर न मिल सके कि वे भारत के तेजी से विकसित हो रहे राजनीतिक जीवन में हिस्सा न ले सकें। मंत्रित्व एक अति महत्वपूर्ण विशेषाधिकार है और दलित वर्ग उसे गंवाना नहीं चाहते। राजनीतिक सुधारों को लागू करने से उन्हें कोई बड़ा लाभ तभी मिल सकता है, जब उन्हें देश के मंत्रिमंडल में स्थान प्राप्त हो सके, जहां से वे सरकारी नीति पर प्रभाव डाल सकें। यह अवसर उन्हें तभी मिल सकेगा, जब उन्हें अपने प्रतिनिधि चुनने का अवसर मिले। उत्तरदायी सरकार के अधीन मनोनीत सदस्य पद के अयोग्य बने रहेंगे। मनोनयन की प्रणाली, जो दलित जातियों को इस अधिकार से वंचित रखती हैं, स्वयं ही निंदनीय है।

  2. दलित जातियों के लिए चुनाव के सिद्धान्त लागू करने के बारे में दो आपत्तियां उठाई जाती हैं।

(क) नर्वाचन क्षेत्रों के गठन में कठिनाई : सभा का विचार है कि यह आपत्ति गंभीर

नहीं है, क्योंकि उसमें ईमानदारी नहीं है। यदि निर्वाचन - क्षेत्रों में गठन के

मामले में कोई ऐसी कठिनाई है, जिसके कारण सरकार को दलित वर्गों के

लिए प्रतिनिधित्व के मामले में निर्वाचन के स्थान पर मनोनयन को तरजीह देनी

पड़ी, तो यह समझ में नहीं आता कि किस प्रकार और किस बूते पर सरकार

ने मुसलमानों तथा यूरोपीयों के लिए निर्वाचन का सिद्धान्त लागू किया। ये

समुदाय भी दलित वर्गों की अपेक्षा कम बिखरे हुए नहीं हैं। इसलिए उनके लिए

भी कोई निर्वाचन - क्षेत्र नहीं बनाया जा सकता जिसमें मौजूदा निर्वाचन - क्षेत्र

भी शामिल है। इसलिए तर्क की दृष्टि के उपरोक्त बात को बेहूदा नहीं कहा

जा सकता। फिर भी बंबई सरकार ने अपनी सद्भावना का परित्याग करते

हुए, जब उसे लगा कि समरूप निर्वाचन - क्षेत्रों का गठन करना असंभव है।

तथाकथित दलित वर्गों के लिए निर्वाचन - क्षेत्रों के गठन के बारे में इन सभी

कठिनाइयों का समाधान सभा द्वारा तैयार की गई प्रतिनिधित्व की योजना में

कर दिया गया है। अतः अब इस बारे में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि

मनोनयन के सिद्धान्त का स्थान निर्वाचन का सिद्धान्त ले ले।

(ख) पर्याप्त संख्या में मतदान प्राप्त करने में कठिनाई : क्या किसी निर्वाचन-क्षेत्र