ग. दलित जातियों के हितों की रक्षा - Page 166

दलित जातियों के हितों की रक्षा

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में इतनी संख्या में मतदाता होंगे, जो परिषद में दलित वर्गों के निर्वाचन को वास्तविक निर्वाचन का रूप दे सकते हैं। मनोनयन के स्थान पर निर्वाचन को स्थान दिए जाने में कठिनाई बताते समय प्रायः यह सवाल उछाला जाता है और उसका उत्तर ‘ना’ में दिया जाता है। इसमें संदेह नहीं कि कठिनाई होगी, यदि यह निश्चय किया जाए मताधिकार की वर्तमान सीमा को छेड़ा नहीं जाएगा और जब तक आज जैसी सीमा बनी रहती है, सभा को स्वीकार करना ही होगा कि दलित वर्गों में निर्वाचकों की संख्या अति अल्प होगी। इसने उत्तरदायी सरकार को मजाक बना दिया है। इसका अर्थ है कि सात लाख लोगों की अल्प संख्या को वर्तमान मताधिकार के अधीन मतदाता होने का सौभाग्य प्राप्त है और वे दो करोड़ लोगों की समूची प्रेसिडेंसी पर हुकूमत करें। ऐसी स्थिति स्पष्टतः रद्दी और भद्दी है और इसे भविष्य में जारी नहीं रखा जा सकता, यदि ऐसी उत्तरदायी सरकार हो जो न केवल नाम की हो, बल्कि काम की भी हो। लगता है कि मताधिकार के प्रश्न पर उसी वर्ग ने समुचित आग्रह नहीं किया है, जो सुधारों की मांग के बारे में सबसे ज्यादा ढोल पीटता रहा है। कहा जाता है कि इस वर्ग का लक्ष्य तो लोकतंत्र है, लेकिन यदि सच बात बताई जाए, तो वर्मा सरकार के शब्दों में ‘‘वे मुख्यतः लोकतांत्रिक संस्थाओं के पक्षधर इसलिए हैं कि वे एक लोकतांत्रिक राष्ट्र से अपील कर रहें हैं। लोकतंत्र की उनकी यह अपील समुचित नहीं है, क्योंकि वे ‘जनता’ की उपेक्षा करते हैं, सुधारों में इनके मुख्य हितों का लक्ष्य वे अधिकार होते हैं, जिन्हें वे कार्यपालिका पर जमाने की आशा करते हैं। उनकी मांग का मूल आधार यह होता ही नहीं कि ग्रामीण मतदाता सच्चे अर्थ में व्यापक मताधिकार और उत्तरदायी मतदान का प्रयोग कर सकें। जब तक वांछित नियंत्रण के लिए उनका अपना वर्ग विधायी पार्षद् प्रदान करता रहेगा, उनके लिए इसका कोई मूल्य नहीं कि वे अल्पसंख्यक मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करें या बहुसंख्यकों का।’’ भले ही मताधिकार के प्रश्न पर भारतीय राजनेताओं के मतभेद का यह सही मूल्यांकन हो या न हो पर तथ्य यह है कि सत्ता के हस्तांतरण के प्रश्न के मुकाबले मताधिकार का प्रश्न कांग्रेस राजनीति में बड़ा ही गौण स्थान रखता है। सभा की राय है कि कांग्रेसी राजनेताओं का यह रवैया मताधिकार और सत्ता के हस्तांतरण के प्रश्न के बीच सच्चे संबंध के नितांत प्रतिकूल है, यह मानना ही पड़ेगा। भारत सरकार का कथन है कि जो शक्तियां इस समय प्रशासन को संभाले हुए हैं, उन्हें तभी हटाया जा सकता है, जब उनका स्थान लेने के लिए संतोषजनक व्यवस्था हो जाए। उसे वे सभी क्षेत्र स्वीकार करेंगे, जो स्थिति के प्रति सही दृष्टिकोण अपनाना चाहते हैं। अब जाहिर है कि ये विकल्प तो निर्वाचक ही होंगे। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि देश की सरकार को कितना और किस प्रकार का दायित्व सौंपा जाए। यह बात निर्वाचकों की संख्या पर निर्भर करेगी। मताधिकार का यह प्रश्न इतना अहम है कि केवल इसी के आधार पर यह तय किया जा सकता है कि राजनैतिक सत्ता का हस्तांतरण कितना हो। अतः मताधिकार