ग. दलित जातियों के हितों की रक्षा - Page 167

150 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

कैसा हो, यह एक अति महत्वपूर्ण सवाल है। फिलहाल इसे जिस प्रकार

तय किया जा रहा है, उसके बारे में सभा बताना चाहती है कि उत्तरदायी

सरकार के मुख्य लक्ष्य की नितांत उपेक्षा की गई है। मताधिकार का अर्थ

है, सहजीवन की शर्तों को तय करने का अधिकार। इसके अलावा और कोई

अर्थ मताधिकार का नहीं हो सकता है। यदि मताधिकार का यह अर्थ है, तो

उसके अनुसार यह अधिकार उन लोगों को दिया जाना चाहिए, जिनके पास

सौदेबाजी की अधिक शक्ति नहीं है और उन्हें इस बात का खतरा है कि उनसे

शक्तिशाली शक्तियों द्वारा सहजीवन की शर्तें इस प्रकार तय की जाएं कि वे

उनके प्रतिकूल हां। यदि यह सच है, तो प्रतिनिधि सरकार के औचित्य का

तकाजा है कि यदि मताधिकार का ठीक - ठीक अर्थ लगाया जाए, तो उसकी

सीमा इतनी नीची हो कि उस तक समाज के निर्धन तथा दलित वर्गों के

बहुसंख्यकों की पहुंच हो। वास्तव में केवल वयस्क मताधिकार की मताधिकार

ही वह प्रणाली है, जो उस शब्द के सही अर्थ के अनुरूप हो सकती है।

लेकिन सभा संतुष्ट हो जाएगी, यदि विधान परिषद् के लिए मताधिकार की

सीमा उसी स्तर पर निश्चित कर दी जाए, जो कि ग्रामीण क्षेत्रों में ताल्लुका,

स्थानीय बोर्ड के लिए है और प्रेसिडेंसी के शहरी इलाकों में वह तीन रुपये

प्रतिमाह का किराया हो। सरकार प्रायः यह आशंका करती रही है कि यदि

मताधिकार की सीमा को इतना कम कर दिया जाएगा, तो उसमें प्रबुद्ध लोगों

का एक बड़ा वर्ग आ जाएगा। यह आशंका निराधार है। यह जरूरी नहीं कि

विशाल सम्पत्ति वाला अज्ञानी न हो। न ही यह जरूरी है कि नितान्त निर्धन

व्यक्ति में ऊचें दर्जे की बुद्धिमत्ता न हो। सम्पत्ति भी कुशाग्रता को कुंठित कर

सकती है। दूसरी ओर निर्धनता बुद्धि को कुशाग्र बनाती ही है और प्रायः उसे

ऐसा करना ही चाहिए। अतः सरकार का यह आग्रह कि अनपढ़ों को रोकने के

लिए विशाल सम्पत्ति की योग्यता होनी चाहिए, अंध - विश्वास के सिवाय और

कुछ नहीं है। इस अंध - विश्वास को सदा सर्वदा उच्च वर्गों तथा सरकार ने

पनपाया है, ताकि जनता-जनार्दन अपनी सरकार का गठन करने के अधिकार

से वंचित रहे।

  1. निर्वाचन प्रणाली : सभा की राय है कि जहां तक दलित वर्गों का संबंध है, सामान्य निर्वाचन - क्षेत्रों में स्वतंत्र चुनाव का सवाल ही नहीं उठता। दूसरी ओर सभा यह भी नहीं चाहती कि सांप्रदायिक निर्वाचक - मण्डल हो। उसकी राय में इतना पर्याप्त होगा कि सामान्य निर्वाचन - क्षेत्रों में दलित वर्गों के लिए आरक्षित सीटों की व्यवस्था कर दी जाए। जहां तक दलित वर्गों में से निर्वाचन के लिए उम्मीदवारों का संबंध है, सभा आग्रह करेगी कि आवासीय शर्त को पूर्णतया रद्द कर दिया जाए और निरपेक्ष की शर्त में आंशिक छूट दी जाए।

  2. विधायिका में प्रतिनिधित्व : सभा सादर इस बात का विरोध करती है कि 1919 में विधायिका में दलित वर्गों के अधिकार को मान्यता नहीं दी गई। जो महत्वपूर्ण मामले सीधे भारत सरकार के नियंत्रण में अथवा कुछ मामले प्रांतीय सरकारों के लिए आरक्षित