ग. दलित जातियों के हितों की रक्षा - Page 168

दलित जातियों के हितों की रक्षा

151

हैं, उनमें भारत सरकार का अब भी सर्वोच्च नियंत्रण है। हस्तांतरित विषयों के बारे में भी उसे निरीक्षण का अधिकार है। अतः यह जाहिर है कि ऐसे विशाल अधिकारों के बारे में दलित वर्गों की भी कोई आवाज होनी चाहिए और सभा मांग करेगी कि बंबई प्रेसिडेंसी में दलित वर्गों के तीन सदस्य ऐसे हों जिन्हें स्थानीय विधान परिषद् में उनके प्रतिनिधि विधायिका के लिए चुने। गारंटी द्वारा संरक्षण

  1. समुचित प्रतिनिधित्व की मांग के अलावा सभा का विचार है कि उसे यह मांग भी करनी ही चाहिए कि देश के संविधान के खडों में उसके मूल अंश के रूप में इस गारन्टी का समावेश किया जाए कि बंबई प्रेसिडेंसी में अल्पसंख्यक के रूप में दलित वर्गों को नागरिक अधिकार प्राप्त हों। ऐसी गारन्टी में दलित वर्गों के हितों से संबधित निम्नलिखित प्रस्थापनाओं की मान्यता भी शामिल हो : -

(1) निश्चय ही दलित वर्गों की शिक्षा को प्रांत के राजस्व पर प्रथम प्रभार के रूप

में मान्यता दी जाएगी और शिक्षा के लिए कुल अनुदान का एक समुचित और

न्यायोचित अनुपात अलग से दलित वर्गों के हित के लिए रखा जाए।

(2) निश्चय ही जाति के किसी बंधन के बिना दलित वर्गों के इस अधिकार को

मान्यता दी जाएगी कि थल सेना, नौ सेना और पुलिस में बिना रोक-टोक

उनकी भर्ती हो।

(3) निश्चय ही 30 वर्ष की अवधि तक दलित वर्गों के इस अधिकार को मान्यता

दी जाएगी कि सभी पदों के लिए, चाहे वे राजपत्रित हों या अराजपत्रित,

भर्ती के मामले में उन्हें वरीयता दी जाएगी।

(4) निश्चय ही दलित वर्गों के इस अधिकार को मान्यता दी जाएगी कि हर

जिले के लिए स्वयं उनमें से पुलिस का एक विशेष इन्सपेक्टर नियुक्त किया

जाएगा।

(5) निश्चय ही प्रांतीय सरकार स्थानीय निकायों में (यथोक्त प्रकार से) दलित

वर्गों के प्रभावी प्रतिनिधित्व के अधिकार को मान्यता देगी।

(6) निश्चय ही दलित वर्गों के इस अधिकार को मान्यता दी जाएगी कि वे भारत

सरकार से अपील कर सकते हैं, यदि प्रान्तीय सरकार इन अधिकारों का

उल्लंघन करे और निश्चय ही भारत सरकार को यह अधिकार दिया जाएगा

कि वह इस मामले में विधि का पालन करने के लिए प्रांतीय सरकार को

विवश कर सकें।

  1. ऐसी गांरटियों का औचित्य : यह कहा जा सकता है कि चूंकि परिषद् में दलित वर्गों को पर्याप्त प्रतिनिधत्व दिया गया है, अतः उनके अधिकारों को वैसा खतरा नहीं हो सकता, जैसा कि प्रतिनिधित्व से वंचित किसी अल्पसंख्यक जाति को हो सकता