152 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
है। प्रश्न उठता है कि फिर यह गारंटियां क्यों दी जाएं? सभा को इस अतिरंजित आस्था के प्रति आशंका है कि प्रतिनिधि शासन - प्रणाली इस बारे में सक्षम हो कि वह बहुसंख्यकों के अत्याचार से अल्पसंख्यकों की रक्षा प्रभावी ढंग से कर सकती है। इस संबंध में सभा आयोग का ध्यान जॉन स्टुअर्ट मिल के विचारों की ओर दिलाना चाह ेगी। उनका विचार है : ‘‘यह धारणा कि लोगों को इस बात की कोई आवश्यकता नहीं है कि वे ‘स्व’ पर नियंत्रण की अपनी शक्ति को सीमित करें, हो सकता है कि उस समय अपने आप में प्रमाण दीख पड़ती हों, जब जन-निर्वाचित सरकार एक ऐसी बात थी जिसकी कि केवल कल्पना ही की जा सकती थी अथवा जिसके बारे में पढ़ा जा सकता था कि वह अतीत की किसी सुदूर अवधि में रही होंगी [. . .] लेकिन अब यह अनुभव किया गया है कि ‘स्व’ राज और स्वयं पर नियंत्रण की लोगों की शक्ति ऐसे वाक्यांश है, जो मामले की सारी तस्वीर पेश नहीं करते। जो लोग अधिकार का प्रयोग करते हैं, वे लोग सदा ही वे ही लोग नहीं होते, जिन पर उनका प्रयोग किया जाता है और चर्चाधीन स्वराज स्वयं द्वारा प्रत्येक पर राज नहीं है, बल्कि शेष सभी के द्वारा प्रत्येक पर राज है। इसके अलावा जनता की इच्छा से अभिप्राय लगभग सर्वाधिक संख्या वालों की इच्छा से है या लोगों के सर्वाधिक सक्रिय अंश से है, या उन लोगों से है जो स्वयं को बहुसंख्यक के रूप में स्वीकार करा लेते हैं। अतः लोग अपनी संख्या के एक अंश को दबाने की इच्छा रख सकते हैं और इसके प्रति भी सावधानी की उतनी ही आवश्यकता है, जितनी शक्ति के किसी अन्य प्रयोग के प्रति। अतः व्यक्तियों पर सरकार की नियंत्रण की शक्ति उस अवस्था में भी महत्व रखती है, जब सत्ताधारी नियमित रूप से समाज के प्रति अर्थात् समाज में सर्वाधिक शक्तिशाली वर्ग के प्रति जवाबदेह हों। यूरोपीय समाज के जिन बुद्धिजीवियों तथा महत्वपूर्ण वर्गों को उनके वास्तविक या काल्पनिक हितों के लिए लोकतंत्र अनुकूल नहीं बैठता, उनके लिए भी यह दृष्टिकोण उतना ही सार्थक है और सहज रूप से अपनी मान्यता को सिद्ध करता है तथा राजनीतिक विचारधारा में अब प्रायः बहुसंख्यकों का ऐसा दोष माना गया है, जिसके प्रति समाज को सचेत रहना चाहिए।’’
- इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रतिनिधि सरकार किसी राष्ट्र में अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के लिए ऐसी गारंटी की पूर्ण उपेक्षा नहीं कर सकती। वास्तव में निर्विवाद रूप से यह आग्रह किया जा सकता है कि प्रतिनिधि शासन प्रणाली में यदि अल्पसंख्यकों की रक्षा के लिए गारंटी की कोई व्यवस्था न हो, तो उसे उस प्रयोजन के लिए नितांत अपर्याप्त समझा जाए और वह उन्हें सुरक्षा प्रदान कर ही नहीं सकेगी और उनके लिए एक अति
खतरनाक तजुर्बा होगा। यूरोप का युद्धेत्तर इतिहास ऐसे मामलों से भरा पड़ा है। मित्र राष्ट्रों और चेकोस्लोवाकिया, आस्ट्रिया, हंगरी, रोमानिया के बीच शांति संधियां तथा पौलेंड और जर्मनी के बीच उत्तरी साइलेशिया के बारे में करार में ऐसे खंड हैं, जिसमें अल्पसंख्यकों के लाभ के हित की गारंटी दी गई है। वे इस बात के ज्वलंत प्रमाण हैं