दलित जातियों के हितों की रक्षा
153
कि अल्पसंख्यक केवल प्रतिनिधि शासन प्रणाली पर निर्भर नहीं रह सकते बल्कि उन्हें अपने अधिकारों के लिए गारंटी के रूप में संरक्षण प्राप्त करना ही चाहिए।
यदि यूरोपीय लोगों में जहां राजनीति को काफी सीमा तक धर्मनिरपेक्ष बना दिया गया है, प्रतिनिधि सरकार इतनी कमजोर है, तो भारत में जहां राजनीति केवल धर्म पर ही आधारित है, वहां सरकार कितनी अधिक कमजोर होगी। दलित वर्गों की रक्षा इस प्रकार की राजनीति से की जानी चाहिए। सच्ची नागरिकता के लिए धर्म पर आधारित यह राजनीति कितनी विनाशकारी हो सकती है, इसका उल्लेख माननीय सर एलेक्जेण्डर काडर्य् के. सी. एस.आई.आई., सी.एस., ने 31 दिसम्बर, 1918 के पत्र संख्या 1146 (सुधार के नोट) में किया है। इस नोट का उद्धरण नीचे दिया जाता है।
‘‘सबसे पहले यह पूछा जाना चाहिए कि लोकतांत्रिक विचार भारत के लोगों के वर्तमान चिन्तनधारा के अनुसार हैं। आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य का आधारभूत सिद्धान्त यह है कि हमें प्रत्येक व्यक्ति के महत्व को स्वीकार करना होगा और यह विश्वास रखना होगा कि चूंकि प्रत्येक व्यक्ति को जीवन एक बार मिलता है, इसलिए उसे उसी जीवन में अपना सर्वोत्तम विकास करने का पूरा अवसर दिया जाना चाहिए। ये सिद्ध ान्त भारत की वर्तमान चिन्तनधारा में स्वीकार नहीं किए जा रहे हैं। आज की सोच यह है कि वर्तमान जीवन पिछले अनेक जीवनों की एक कड़ी है। इस जीवन में प्रत्येक व्यक्ति की स्थिति उसके पिछले जन्मों के अच्छे और बुरे कर्मों का ही फल है। इसलिए सामाजिक जीवन में उसका स्थान निश्चित है, जिसे बदला नहीं जा सकता। अतः यह बात स्वीकार करनी होगी कि लोकतंत्र के आधारभूत सिद्धान्त उन विचारों के प्रतिकूल हैं, जिन पर भारत में लोग हजारों वर्षों से विश्वास करते आए हैं।
‘‘इस सिद्धान्त से कि वर्तमान जन्म में प्रत्येक व्यक्ति का स्थान उसके पिछले जन्मों के कर्मों का फल है, मिलती-जुलती बात वर्ण व्यवस्था है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति की सामाजिक स्थिति अपरिवर्तनीय है। इस प्रकार ब्राह्मण के घर पर जन्मा व्यक्ति ब्राह्मण के अलावा दूसरा नहीं हो सकता और पैरियार (दक्षिण का अछूत) के घर जन्मा व्यक्ति कभी भी पैरियार के अलावा दूसरा नहीं हो सकता। इन परिस्थितियों में अवसर की समानता असंभव है और भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह अवांछनीय नहीं है।
इस वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मण सर्वोच्च है। यह जाति कम से कम दक्षिण भारत में प्रारम्भ से जातिभेद की प्रणेता रही है और इसने अन्य सभी जातियों पर अपना पूर्ण वर्चस्व स्थापित किया है। ब्राह्मणों का वर्चस्व का दावा केवल जाति और बुद्धि पर ही आधारित नहीं है, बल्कि यह धर्मादेशों पर भी आधारित है। भारत में सदियों से ब्राह्मण को पवित्र माना गया है। उसे लोग भोजन कराकर उसकी शिक्षा और उसकी पुत्रियों के विवाह के लिए धन देकर तथा उसे भूमिदान करके धार्मिक पुण्य प्राप्त करने में विश्वास करते आए हैं। ब्राह्मणों को अनेक विशेषाधिकार प्राप्त हैं :
- ‘‘जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में इस प्रकार के वर्चस्व के कारण ब्राह्मणों ने सहज ही रा