ग. दलित जातियों के हितों की रक्षा - Page 171

154 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

जनीति पर भी आधिपत्य जमा लिया है - विशाल पैरियार समुदाय अथवा मसीही समुदाय का कोई भी प्रतिनिधि न तो कभी इन चुनाव क्षेत्रों में से किसी से चुनाव लड़ा है, न ही कभी उसे लड़ने का अवसर मिलेगा। यह अनुभव इस बात का जोरदार संकेत देता है कि अतीत की भांति भविष्य में भी राजनैतिक तंत्र ब्राह्मणों के ही हाथ में रहेगा, जब तक कि अन्य वर्गों के पर्याप्त प्रतिनिधित्व के लिए विशेष उपाय न किए जाएं।

  1. ‘‘ब्राह्मणों के बाद लम्बे अर्से से हिन्दू जातियों का वह विशाल समूह चला आ रहा है, जिसमें कुछ ऊंची और कुछ नीची जातियों के लोग हैं। वे सामान्यतः गैर - ब्राह्मण समूह कहे जाते हैं, लेकिन वे सभी एक - दूसरे से अलग - थलग हैं और अधिकतर एक - दूसरे का विरोध करते हैं। वे इस बारे में बदनाम हैं कि यदि इन जातियों में से किसी एक का सदस्य प्रभावशाली पद प्राप्त कर लेता है, तो वह नियंत्रण वाले कार्यालयों में अपनी जातीय भाइयों को भर देता है। सरकार के स्थायी आदेश इस प्रवृर्त से पि­ रचित हैं और उसे दूर करने के लिए उनमें निर्देश हैं। संयुक्त रिपोर्ट भी इसके बारे में जानकारी रखती है, क्योंकि उसमें कहा गया है - ‘भारतीय समाज में धर्म, नस्ल और जाति की अनेक दरारें हैं जो सदा ही उसकी एकजुटता के लिए खतरा हैं।’ जाति के ये भेद न केवल भारतीय समाज की एकजुटता के लिए खतरा पैदा करते हैं, बल्कि उनके कारण कभी ऐसी एकजुटता आई ही नहीं।

  2. ‘‘ब्राह्मणों तथा गैर - ब्राह्मण सवर्ण हिन्दूओं के बाद उन छोटी जातियों अथवा अधिक सही ढंग से कहा जाए, तो जातिहीन व्यक्तियों का नम्बर आता है, जिनकी संख्या इस प्रेसिडेंसी (अर्थात् मद्रास) में कोई एक करोड़ है। सुविधा के लिए उन्हें पंचमांह अथवा पैरियार जाति के लोग कहा जा सकता है। इन लोगों को न केवल छोटी जाति का माना जाता है, बल्कि उनकी उपस्थिति मात्र से ही वास्तव में ऐसी अपवित्रता आ जाती है, जिसे दूर करने के लिए धार्मिक कर्मकांड करना पड़ता है।

  3. ‘‘यह एक ऐसा समाज है, जो अनपढ़ है, जो निश्चित विभेद वाली जातियों में बंटा है। उसमें ब्राह्मण सर्वोच्च हैं। विभिन्न गैर - ब्राह्मण हिन्दू जातियां मध्यक्रम में हैं और सबसे नीचे छोटी जातियों के लोग हैं, जिन पर दोनों ही निस्संकोच भाव से अत्याचार करते हैं। ऐसे समाज में लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थापना करना अति कठिन कार्य है। लगता है कि संयुक्त रिपोर्ट तैयार करने वालों ने भी पर्याप्त रूप से इस कठिनाई को अनुभव नहीं किया। ‘निश्चय ही सुधार की किसी योजना का पहला बुनियादी उसूल यह होता है कि आबादी के मूक विशाल जनसमूह के उत्तम प्रशासन के लिए पर्याप्त रक्षोपायों की व्यवस्था की जाए।’ ’’

  4. ‘‘यदि वर्तमान स्थिति का यह यथार्थ वर्णन है तो यूरोप के अल्पसंख्यकों की तुलना में दलित वर्गों के अधिकारों की गारंटी का अधिक औचित्य है। परिस्थितियों के कारण विश्व में बहुत से लोग पिछड़ गए हैं, परन्तु पिछड़ने के बाद भी वे ऊपर उठने के लिए स्वतंत्र हैं। दलित वर्ग से पिछड़े वर्ग रहे हैं, क्योंकि उनका उत्थान देश