ग. दलित जातियों के हितों की रक्षा - Page 172

दलित जातियों के हितों की रक्षा

155

के अधिसंख्य लोगों की धार्मिक भावनाओं से मेल नहीं खाता। विभिन्न विधान परिषद्ों द्वारा पारित संकल्पों के बारे में कुछ लोगों ने मूडीमेन कमेटी के सामने बहुत कुछ कहा है, जैसे दलित जाति के लोगों को कुओं से पानी भरने दिया जाए, उनके लिए डिस्पेंसरियां और धर्मशालाएं खोली जाएं शिक्षा मंत्रियों द्वारा जारी किए गए परिपत्रों का भी उल्लेख किया गया है, जिनमें कहा गया है कि दलित वर्गों के लोगों के बच्चों को भी स्कूलों में अन्य बच्चों के साथ दाखिला दिया जाए। परन्तु ये संकल्प और परिपत्र कितने बड़े मजाक हैं, यह आयोग के परिशिष्ट ‘क’ के इस वक्तव्य को पढ़ने से स्पष्ट हो जाएगा। इससे दलित वर्गों के प्रति अधिसंख्य लोगों के दृष्टिकोण का पता चलता है, जैसा कि देश के विभिन्न समाचारपत्रों में समय - समय पर प्रकाशित घटनाओं (मद सं. 1 और 10) से स्पष्ट है। इन समाचारों को पढ़ने से पता चलेगा कि दलित वर्गों को सेना, नौ सेना और पुलिस में भर्ती नहीं किया जा सकता, क्योंकि इससे अधिसंख्य लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचती है (मद सं. 8) उन्हें स्कूलों में दाखिला नहीं दिया जा सकता, क्योंकि उनका दाखिला अधिसंख्य लोगों की धार्मिक भावनाओं के प्रतिकूल है (मद स.ं 12)। वे सरकारी डिस्पेंसरियों से इलाज नहीं करा सकते, क्योंकि डाक्टर उन्हें अपनी डिस्पेंसरियों को तथा स्वयं को दूषित नहीं करने देंगे (मद सं. 2 और 5)। वे साफ सुथरे नहीं रह सकते, क्योंकि अपनी एक निश्चित स्थिति से ऊपर जीवनयापन करना अधिसंख्य लोगों की धार्मिक भावना के आड़े आता है (मद सं. 1 और 6)। इस सामाजिक संहिता को इतनी कड़ाई से लागू किया जाता है कि दलित वर्गों के नागरिकता के अपने अधिकार का प्रयोग करने से अधिसंख्य लोग भड़क जाते हैं और वे और अधिक सामाजिक अत्याचार करते हैं (मद सं. 4, 7 और 11)। यह स्वीकार करना होगा कि जब समाज ही अत्याचार पर उतर आए तो इसके अत्याचार उन्हीं कार्यों तक सीमित नहीं रहते, जो इसके अधिकारी लोग करते हैं और ये आत्मा को ही दास बना देते हैं। ऐसे अत्याचार से रक्षा राज्य की पुलिस ही कर सकती है। परन्तु दुर्भाग्यवश ऐसे संघर्ष में जिसमें एक ओर दलित वर्ग हो और दूसरी ओर सवर्ण हिन्दू हों, पुलिस की शक्ति सदैव अत्याचारी बहुसंख्यकों के साथ होती है (मद सं. 11)। इसका कारण यही है कि दलित वर्गों का कोई व्यक्ति देश की पुलिस अथवा मजिस्ट्रेटों में नहीं होता।

इसे ध्यान में रखते हुए दलित वर्गों के प्रति यह अन्याय होगा कि उन्हें इस धारणा के भुलावे में रखा जाए कि उनके हित तो उनके देशवासियों के हाथों में सुरक्षित रहेंगे, क्योंकि दलित वर्गों के पक्ष में कुछ परिषद्ों ने संकल्प पारित किए हैं और कुछ मंत्रियों ने परिपत्र जारी किए हैं। सभा आयोग को यह चेतावनी देना चाहती है कि वह हिन्दू बहुमत के सर्वोत्तम उदाहरणों के प्रलोभन में पड़कर उसके बारे में बेहतर राय न बना लें। एक ओर भाईचारे के साथ प्राधिकार के आदेश का प्रयोग करना, दूसरी ओर भाईचारे के साथ आदेश का पालन करना और आश्रितों के बहुजन हिताय के लिए सभी