दलित जातियों के हितों की रक्षा
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करने का कोई उपाय नहीं है कि उन्हें चारों वर्णों में से किसी एक वर्ण में शामिल कर लिया जाए या उनकी वर्तमान सामाजिक स्थिति में परिवर्तन किया जाए।
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विद्वान वक्ता ने उत्थान के अयोग्य पतितों के उत्थान की एकमात्र संभावना बताई अर्थात् उनके कुछ उन अहरणीय धन्धों को उदारतापूर्वक पुनः उन्हें सौंप दिया जाए, जिन्हें आजकल अविचारशील तथा अरूढि़वादी सवर्ण लोगों ने हथिया लिया है। महामहोपाध्याय ने कहा, ‘‘20वीं शताब्दी में लोग सवेरे उठते हैं और अपने कीमती जूते साफ करने बैठ जाते हैं और बजाए इसके कि वे अपना नियत प्रातःकालीन धर्म - कर्म करें, फिर वे अपनी हजामत आप करने लगते हैं। स्वदेशी ढंग से अपने दांत साफ करने के बजाए (बबूल की दातून से) अपने दांतों से ब्रुश रगड़ने लगते हैं। ऐसा करके वे मोची, हज्जाम और दातून बेचने वालों को उनके व्यवसाय से वंचित करते हैं। सब धर्मानुसार कार्य करें और संतुष्ट रहें, अंत्यजों के उत्थान का यही एकमात्र उपाय है, जिन लोगों ने इन पतितों को उनकी रोटी, रोजी से वंचित कर दिया है, वे ही उन्हें उसे वापस करें।’’ मद संख्या 2
‘‘टाइम्स आफ इंडिया’’, 2 मार्च, 1928 से) भारत में अंत्यज
लेकिन देशभक्त भड़केंगे, यह सब ब्रिटिश भारत में हुआ, भारतीयों के भारत में नहीं। अभी हाल में मध्य भारत के एक देशी बड़े राज्य में बलाइयों पर क्या बीती? जब उन्होनें सोने और चांदी के आभूषण पहने और स्पृश्य सवर्ण हिन्दू जैसा व्यवहार करने का भद्दा काम किया। और यह है ‘‘सौराष्ट्र का समाचार बड़ौदा राज्य क्षेत्र के अत्ंयजों के बारे में, जहां महाराजा को स्वयं इन अभागों से गहरी सहानुभूति है’’। गुजराती स्कूलों में अंत्यज छात्रों की भर्ती का प्रावधान केवल कागजी कार्यवाही है। लगभग 95 प्रतिशत स्कूलों में अंत्यज बच्चों को कक्षा से बाहर सर्दी, गर्मी और बरसात में बैठे रहना पड़ता है। उनसे गोबर, ईंधन, मिट्टी आदि मंगाई जाती है। अप्रैल 1927 में एक अंत्यज दामनगर डिस्पेन्सरी में दवाई लेने गया। तो डाक्टर ने उसे बारह घंटे इंतजार में खड़ा रखा। इसके बाद उसकी जांच दूर से ही की और दूर से ही उसे दवाई दी। यह सब कुछ बड़ौदा विधायिका के एक अंत्यज सदस्य के सामने हुआ और सूरत का ‘प्रताप’ लिखता है कि जब नवासरी अंत्यज आश्रम का एक अध्यापक एक बीमार छात्र को स्थानीय अस्पताल में ले गया, तो उन दोनों को प्रभारी डाक्टर ने यह कहकर भगा दिया, ‘‘भाग जाओ यहाँ गांधी का राज नहीं, बड़ौदा सरकार का राज है।’’