दलित जातियों के हितों की रक्षा
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झूठी अफवाह
जब 20 तारीख की सुबह सम्मेलन फिर शुरू हुआ तो पहला संकल्प जिसमें यह घोषणा की गई कि सवर्ण हिन्दू दलितों के लिए क्या करें, दलित वर्गों के सदस्यों द्वारा सम्मेलन के समक्ष रखा। अध्यक्ष ने सर्वश्री पुरुषोत्तम प्रभाकर जोशी और गोविंद नारायण धारिया (ऊंची जातियों के प्रतिनिधि) से संकल्प पर बोलने का अनुरोध किया। संकल्प में अन्तर्जातीय विवाह से संबंधित एक खंड को छोड़कर उन दोनों ने संकल्प को स्वीकार किया। इस संकल्प को लेकर आम सहमति थी। इसलिए सम्मेलन का सत्र समाप्त होने के बाद सभी लोग एकत्र होकर उस तालाब की ओर बढ़े। जुलूस अत्यन्त शांत था और सब कुछ शांति से गुजरा। परन्तु लगभग दो घंटे बाद बाहर के कुछ बददिमाग लोगों ने एक अफवाह फैला दी कि दलित वर्गों के लोगों का इरादा वीरेश्वर मंदिर में घुसने का है, जिससे बदमाश लोगों की बहुत बड़ी भीड़ इकट्ठा हो गई। उनके पास लाठियां भी थीं। भीड़ शीघ्र आक्रामक हो गई और सारा शहर गुंडों की चपेट में आ गया, जो दलितों के खून के प्यासे लगते थे। बीस घायल
दलित वर्गों के लोग अपने-अपने गांवों को रवाना होने से पहले खाना खा रहे थे। जब उनमें से अधिकांश चले गए, तो गुंडे रसोई में घुस गए जहां दलित लोग खाना
खा रहे थे। दोनों दलों के बीच युद्ध छिड़ सकता था, परन्तु दलित वर्गों के नेताओं ने अपने लोगों को रोक लिया और इस प्रकार भीषण दंगा टल गया। जब गुंडों को मुकाबला करने वाला कोई नहीं मिला, तो उन्होनें सड़क पर घूमना शुरू कर दिया और उन इक्का दुक्का दलितों पर हमला करना शुरू कर दिया, जो अपने गांवों को लौट रहे थे। वे दलितों के घरों में भी घुस गए और उन्हें बुरी तरह पीटा। कुल मिलाकर 20 दलित घायल हुए। इस घटना में दलितों का व्यवहार प्रशंसनीय था, जब कि बड़ी जातियों के अनेक लोगों का बर्ताव निंदनीय था। जो दलित वहां इकट्ठा हुए थे, उससे कहीं ज्यादा बड़ी जातियों के लोग आ धमके। परन्तु क्योंकि उनके नेताओं का उद्देश्य अहिंसक और पूरी तरह संविधानसम्मत था, इसलिए दलितों ने कोई आक्रामक रुख नहीं अपनाया। दलित वर्गों के पक्ष में यह बहुत बड़ी बात है कि यद्यपि उन्हें बुरी तरह उकसाया गया था, किन्तु इसके बावजूद उन्होंने आत्मसंयम बरता। महाड़ सम्मेलन से यह सिद्ध होता है कि ऊंची जातियां दलितों को सार्वजनिक पनघटों से पानी लेने जैसे प्राथमिक नागरिक अधिकारों के उपयोग के विरुद्ध हैं।
महाड़ और कोलाबा जिलों में सवर्ण हिन्दुओं का सबसे निंदनीय कार्य यह था कि विभिन्न गांवों के अपनी जाति भाइयों को उन्होंने तुरन्त संदेश भेज दिया कि जैसे ही सम्मेलन से भाग लेकर दलित लोग अपने गांवों में पहुंचे, उन्हें दण्ड दें। इसके परिणामस्वरूप, जो लोग महाड़ सम्मेलन से लौटे, उनके साथ गांव पहुंचने से पहले