दलित जातियों के हितों की रक्षा
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पढें, समझें और सिर धुनें
काठियावाड़ के एक गांव में दलित वर्गों के बच्चों के लिए एक स्कूल है। अध्यापक एक सुसंस्कृत और देशभक्त व्यक्ति है जो डेढ जुलाहा (अस्पृश्य) जाति से है। उन्होंने महामहिम गायकवाड़ की अनिवार्य शिक्षा नीति के तहत शिक्षा प्राप्त की है और वह अपनी जाति के उद्धार के लिए भरसक प्रयास कर रहे हैं। वह इतने सभ्य तथा सुसं स्कृत व्यक्ति हैं कि कोई भी उन्हें अस्पृश्य जाति का व्यक्ति नहीं कह सकता। परन्तु उसे क्योंकि सौभाग्यवश या दुर्भाग्यवश काठियावाड़ के एक रूढि़वादी गांव में अपने ही जाति के बच्चों को पढ़ाना पड़ रहा है, अतः उन्हें सब कोई अस्पृश्य ही मानते हैं। परन्तु इस सबकी परवाह किए बिना वह शान्तभाव से अपना कार्य कर रहे हैं। कभी - कभी ऐसे भी क्षण आते हैं, जब धैर्यवान व्यक्ति भी यदि असहनीय परिस्थितियों में रह रहा है तो अपनी वेदना और प्रताड़ना को प्रकट कर देता है। वह इस स्कूल मास्टर के निम्नलिखित पत्र से प्रकट हो जाता है। इसके हर छोटे से छोटे वाक्य से करुणा टपक रही है। मैंने पत्र में लिखे गांव के नाम और सम्बद्ध व्यक्तियों के नाम जान - बूझकर प्रकट नहीं किए हैं, ताकि कहीं ऐसा न हो कि स्कूल मास्टर को और कष्ट सहने पड़े।
- नमस्कार। मेरी पत्नी ने इस महीने की पांच तारीख को एक बच्चे को जन्म दिया। 7 को वह बीमार पड़ गई, उसे दस्त लग गए, आवाज बंद हो गई, सांस लेने में तकलीफ होने लगी, छाती पर सूजन आ गई और पसलियों में दर्द होने लगा। मैं डॉ. -- को बुलाने गया, लेकिन उसने कहा, ‘‘मैं अस्पृश्य के घर नहीं जाऊंगा। मैं उसकी जांच भी नहीं करूंगा।’’ तब मैं नगरसेठ के पास गया और गरसिया दरबार के पास गया और उनसे गुजारिश की कि वे इस मामले में मेरी मदद करें। वे आए और नगरसेठ ने जब यह जमानत दे दी कि मेरी ओर से फीस के रूप में वे दो रुपये डाक्टर को देंगे और इस शर्त पर, कि मरीज को घर के बाहर निकालने के बाद ही वह उसे देखेगा, वह आने को तैयार हो गया। वह आया और दासे दिन की जच्चा को बाहर निकलवा दिया। तब डाक्टर ने थर्मामीटर एक मुसलमान को दिया। फिर उसने मुझे दिया। मैंने थर्मामीटर लगाया और मुसलमान को लौटाया और उसने डाक्टर को दिया। तब कोई रात के आठ बजे होंगे और लैम्प की रोशनी में डाक्टर ने थर्मामीटर देखकर कहा कि ‘‘इसे निमोनिया है और सांस घुट रही है’’। इसके बाद डाक्टर चला गया और दवाई भेज दी। मैंने बाजार से अलसी का तेल खरीदा और हम उसकी छाती पर अलसी के तेल की पुल्टिस बांध रहे हैं और दवाई दे रहे हैं। डाक्टर फिर उसे जांचने को तैयार नहीं हुआ। उसने दूर से ही देखा। मैंने उसे फीस के दो रुपये दिये। बीमारी खतरनाक है। सब कुछ ऊपर वाले के हाथ में है।