दलित जातियों के हितों की रक्षा
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छोड़ना पड़ा जहां उनके पुरखे पीढि़यों से रहते थे। वे धार, देवास, बागली, भोपाल, ग्वालियर जैसे पड़ोसी दूसरे राज्यों के गांवों में जा बसे। जबरन समझौता
इंदौर से उत्तर में केवल 7 मील दूर रेवती गांव के हिन्दुओं ने कुछ दिन पहले बलाइयों को आदेश दिया कि वे दूसरे गांवों के हिन्दुओं द्वारा बलाइयों के विरुद्ध बनाए गए नियमों पर आधारित स्वीकृत समझौते पर हस्ताक्षर करें। बलाइयों ने इंकार कर दिया। बताया जाता है कि उनमें से कुछ का हिन्दुओं ने बुरी तरह ठुकाई की और एक को खम्बे से बांध दिया और कहा कि उसे तभी छोड़ा जाएगा जब वह समझौते पर हस्ताक्षर के लिए राजी हो जाए। उसने हस्ताक्षर कर दिए और जान छुड़ाई। कुछ बलाई दौड़कर अगले दिन 20 दिसम्बर को प्रधान मंत्री के पास चले गए और उन्हें रेवती गांव के हिन्दुओं के जुल्म की रामकहानी सुनाई। उन्हें जिले की सभा के पास भेजा गया। इस अधिकारी ने पुलिस की सहायता से जांच की और सिफारिश की कि हिन्दुओं के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 342 और 147 के अधीन और बलाइयों के विरुद्ध धारा 147 के तहत कार्रवाई की जाए।
बलाइयों ने गांव छोड़ा
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जाति उत्पीड़न
कानून की जानकारी न होना, एक असुविधा
कई गांवों के बलाइयों के प्रति हिन्दुओं के व्यवहार में कोई सुधार नहीं हुआ। यह पहले बताया जा चुका है कि सवर्ण हिन्दुओं ने बलाइयों के साथ दुर्व्यवहार किया। इंदौर जिले के अकेले देपालपुर परगने में भारी संख्या में बलाइयों को घर छोड़ने पड़े और आसपास के राज्यों में शरण लेनी पड़ी। जिन गांवों से बलाइयों को भागना पड़ा वे हैं % बदोली, अहिर खेड़ाल, पिपलोदा, मूरखेड़ा, पामलपुर, बड़ौदा, चटवाड़ा, नवरीपान, सनौधा, अजनौटी खतेड़ी और सनावड़ा। पामलपुर गांव तो पूरी तरह उजड़ गया और वहां बलाइयों का नामोनिशान नहीं है। बताया जाता है कि इन गांवों के एक निवासी नंदा बलाई की हिन्दुओं ने जमकर धुनाई की। रिपोर्ट के अनुसार एक गांव में हिन्दुओं ने बलाइयों की सभी झोंपडि़यों में आग लगा दी और अभियुक्तों का अभी तक कोई सुराग नहीं मिला है।
बलाई भोले-भाले ग्रामीण हैं और कानून से अंजान हैं। उन्हें विश्वास है कि एक बार सरकार को अर्जी भेज देने से सब कुछ खुद ही ठीक हो जाएगा। उन्हें अपनी शिकायत दर्ज कराने का न तरीका पता है और ना ही उनके पास साधन हैं। और बताया जाता है कि वे कुछ मामलों में अपने आरोपों के समर्थन में न कोई गवाह पेश कर सके और न खुद पेश हो सके। मजिस्ट्रेट के पास इसके सिवा कोई चारा नहीं था कि वह मुकदमा खारिज कर दे।