166 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
मराठा मुस्लिम दलित उन्नत पारसी ईसाई अन्य कुल
और वर्ग हिन्दू व यहूदी
सम्बद्ध
जातियां
सचिवालय 31 11 - 268 38 31 11 440
लोक निर्माण 6 - - 64 8 10 3 91 विभाग
बंबई कलक्टर 3 8 - 28 - 4 1 44
आबकारी आयुक्त 1 - - 12 5 - - 18
लघुवाद न्यायालय 9 7 - 58 1 5 8 97
उच्च न्यायालय 4 15 - 125 22 23 9 198
बंबई पुलिस के 7 4 - 32 - 4 - 47 न्यायालय
बंबई पुलिस आयुक्त - 7 - 59 - 4 - 87 मद संख्या 10
‘‘टाइम्स आफ इंडिया’’, 30 मई, 1928) चमारदास और महारदास
ये बड़े - बड़े राजनीतिक सूरमा अस्पृश्यों की मजबूरियों और मुसीबतों का जब बखान करते हैं, तो वे कितने ईमानदार होते हैं, यह बात महाराष्ट्र सम्मेलन में उस समय एकदम साफ हो गई, जब अस्पृश्यता निवारण के प्रश्न को चालाकी से टाल दिया गया। इस चालाकी का विरोध करने वाले लगभग आधा दर्जन लोग स्वराज्य से जुड़े थे। उनमें से एक ने उस पत्र में एक ब्लाग लेख लिखा जिसमें इस विकट समस्या के बारे में आम हिन्दुओं के दृष्टिकोण का भंडाफोड़ किया गया था और महाराष्ट्र सम्मेलन में जो कुछ हुआ था, उस पर पर्याप्त प्रकाश डाला गया था। पूना के समता संघ के बारे में लेखक का कहना है, ‘‘मेरे एक मित्र ने बातचीत के दौरान एक दिन मुझसे कहा, ‘चूंकि आप जैसे लोग उनसे मिल जाते हैं, इसलिए ये चमारदास और महारदास इतने गुस्ताख हो जाते हैं’ [...] ।’ इस कथन से कोई भी समझ सकता है कि सवर्ण हिन्दुओं के मन में अभी भी अस्पृश्यों के प्रति कितनी अधिक नफरत भरी है।’’ संकल्प और कृत्य
खिन्न सुधारवादी लेखक आगे कहता है, महात्मा जी ने उद्घोषणा की है कि अस्पृश्यता हिन्दू धर्म पर कलंक है। स्वामी श्रद्धानन्द और लाला लाजपत राय ने कहा है कि जब तक हिन्दू समाज से अस्पृश्यता का निवारण नहीं होगा, तब तक