ग. दलित जातियों के हितों की रक्षा - Page 185

168 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

कारण दलित वर्गों के लोगों के लिए इन गांवों में रहना दूभर हो गया है। (3) इस सम्मेलन की यह दृढ़ सम्मति है कि भारत को स्वराज की कोई अगली

किस्त तब तक न दी जाए, जब तक कि दलित वर्गों के हितों की रक्षा के

लिए कोई समुचित व्यवस्था न कर ली जाए। मद संख्या 12

‘‘बंबई क्रानिकल’’, दिनांक 20 - 10 - 27 से)

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नगरपालिका के स्कूल (बंबई शहर में)

स्कूल कमेटी ने पानी के ‘लोटों’ के मामूली से सवाल पर सहम कर अपनी स्थिति हास्यास्पद बना ली है, ऐसा लगता है कि निगम के इस संकल्प के बावजूद कि नगरपालिका के स्कूलों में जाति का कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए, ‘दलित वर्गों’ के बच्चों को पानी पीने के लिए अलग लोटे दिए जाते हैं। स्कूलों की कमेटी की एक उपसमिति ने सिफारिश की कि सभी बच्चों को एक से लोटे दिए जाएं। लेकिन स्कूलों की कमेटी के सदस्य इस सिफारिश के बारे में गहन सोच में पड़ गए और सभी प्रकार की आशंकाएं उन्होंने व्यक्त की। कुछ ने कहा कि परिवर्तन से सवर्ण हिन्दू क्षुब्ध हो जाएंगे। जाहिर है कि छोटी जाति के हिन्दुओं के क्षोभ का तो कोई ज्यादा महत्व ही नहीं होता। प्रो. बी.जी. राव ने कहा कि यह एक क्रान्तिकारी परिवर्तन है। श्री डी.जी. दलवी ने, जो स्वयं एक जानमाने समाज - सुधारक हैं, इन आशंकाओं में एक कानूनी आशंका जोड़ दी कि कुछ माता - पिता तो कमेटी पर मुकदमा ठोक सकते हैं। अंततः स्कूलों की कमेटी ने यह मसला विचार के लिए पुनः उपसमिति को भेज दिया, जिसका एक प्रकार से यही अर्थ था कि उन्हें उपसमिति की सिफारिश स्वीकार्य नहीं है। जान-बूझकर किया गया अपमान

उपरोक्त आशंकाएं बेतुकी हैं, क्योंकि हर बच्चे से आशा की जाती है कि वह लोटे को सफाई की दृष्टि से और यदि वह जातिभेद पर विश्वास रखता है, तो जाति की दृष्टि से उसे भली - भांति साफ रखे। जिस लोटे को एक बार कोई ‘अस्पृश्य’ बच्चा इस्तेमाल कर लेता है, वह लोटा साफ हो जाने के बावजूद ‘स्वर्ण हिन्दुओं’ के बच्चों के लिए स्वयमेव अस्पृश्य या बेकार हो जाता है। यह बात अभागे ‘दलित वर्गों’ के बच्चों का जान-बूझकर किया गया अपमान है। निश्चय ही हमें यह आशा नहीं थी कि स्कूलों की कमेटी उसका समर्थन करेगी। श्री दलवी ने कहा कि कुछ क्षेत्रों में अनिवार्य शिक्षा को दृष्टि में रखते हुए माता - पिता कमेटी पर यह दावा ठोक सकते हैं कि उसने ऐसे दायित्व को लागू किया है, जो किसी भी प्रकार कानूनी नहीं है। लेकिन किसी पर भी यह दायित्व नहीं डाला जा सकता कि वे स्कूलों में सांझे लोटों का इस्तेमाल करें। जो माता - पिता अधिक कट्टर हैं, अपने बच्चों को उनके निजी लोटे दे सकते हैं, और अपने ‘धर्म’ की रक्षा कर सकते हैं। जहां तक दलित वर्गों का संबंध है, उनका अपमान तो होता ही है, चाहे वे अपना निजी लोटा लाएं या अन्य स्कूलों में चले जाएं जहां न्याय का और अच्छा वातावरण हो।