भारतीय सांविधिक आयोग के समक्ष
175
डॉ. अम्बेडकर : जरायम पेशा जातियों का शेष हिन्दुओं से इतना कम सामाजिक संपर्क होता है कि इस विषय पर कोई निश्चित बात कहने का कोई आधार नहीं है, परन्तु यदि उनका संपर्क होता, तो वे अस्पृश्य ही माने जाते।
- कुछ ऐसी जातियां हैं, जो स्पृश्यता और अस्पृश्यता के बीच खड़ी हैं?
डॉ. अम्बेडकर : मेरा विचार है कि वे अस्पृश्यों से भी नीचे हैं?
- नहीं, सामाजिक स्थिति में ऊंची एक ऐसी जाति है, जो अर्ध अस्पृश्य है?
डॉ. अम्बेडकर : मैं कह नहीं सकता परन्तु मैं समझता हूँ कि जरायम पेशा जातियों के बारे में हमारे पास कोई आंकड़े नहीं हैं कि वे अस्पृश्य हैं या नहीं, क्योंकि मुख्य हिन्दुओं और जरायम पेशा जातियों के बीच संपर्क नाममात्र का होता है।
- जरायम पेशा और आदिम जातियों को छोड़ दें। मैं अब अस्पृश्यों की बात कर रहा हूँ। स्वयं अस्पृश्यों में भी अंतर है, उनमें से कुछ ऐसे हैं, जो अर्ध अस्पृश्य माने जाते हैं?
डॉ. अम्बेडकर : (दोनों साक्षी) जी नहीं।
- मैं आपको एक मिसाल देता हूँ। चमारों की क्या स्थिति है?
डॉ. अम्बेडकर : वह पूरी तरह अस्पृश्य हैं।
- उतना ही जितना महार?
डॉ. अम्बेडकर : जी हां।
- क्या आपको इसका विश्वास है?
डॉ. अम्बेडकर : जी हां, यदि आप सांझे पनघट और मंदिर प्रवेश को मापदंड मानें।
- जी नहीं, मेरा अस्पृश्यता से आशय है कि छू जाने से सवर्ण हिन्दू अपवित्र हो जाएगा।
डॉ. अम्बेडकर : ठीक है, आप मंदिर प्रवेश और कुएं को मापदंड मान सकते हैं।
चेयरमैन : आखिरकार हम बुनियादी तौर पर संवैधानिक और राजनीतिक जांच - पड़ताल कर रहे हैं। सामाजिक प्रथाओं और ऐसी धार्मिक परंपराओं को जिनकी जड़ें बहुत गहरी हैं, किसी आयोग द्वारा एक दिन में दूर नहीं किया जा सकता। यह एकदम साफ बात है। दलित वर्गों का अर्थ है, अस्पृश्य जातियां, वे जातियां जिनका मंदिर - प्रवेश वर्जित है और जिन्हें स्कूलां, धर्मशालाओं आदि की सुविधाएं प्राप्त नहीं है। जैसा कि माननीय हरसिंह गौड़ ने कहा है, जरायम पेशा व पर्वतीय जनजातियां और इसी तरह के लोग, जो भारत में रहते हैं और राजनीतिक और संवैधानिक दृष्टि से इनके साथ वे भी जो सभ्यता में पिछड़े हैं, उनकी ओर भी हमारा ध्यान जाना चाहिए।
माननीय हरिसिंह गौड़ : हिन्दू चार वर्णों में विभक्त हैं। शूद्रों का मंदिर प्रवेश