घ. भारतीय सांविधिक आयोग के समक्ष - Page 198

भारतीय सांविधिक आयोग के समक्ष

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  1. चेयरमैन : मेरे विचार में जो आपने हमें बताया है, वह काफी रोचक है, परन्तु हम उसे अपनी इस जांच पर लागू नहीं कर सकते, क्योंकि इस आयोग का यह काम नहीं है कि वह रोजमर्रा के प्रशासन में दखलंदाजी करे?

डॉ. अम्बेडकर : जी, नहीं।

  1. आप अपने इस विचार के समर्थन में ये दलील दे रहे हैं कि दलित वर्गों को पूरा प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए?

डॉ. अम्बेडकर : सेवाओं में।

  1. क्या यह आपका विचार है?

डॉ. अम्बेडकर : मेरा यही विचार है। इस प्रेसिडेंसी के न्यायालयों में वास्तव में जो होता है, उसके कुछ उदाहरण मैं देना चाहूंगा। मुझे एक अदालत में दलित वर्ग के एक व्यक्ति की पैरवी करने का मौका मिला और मुझे यह देखकर बड़ी हैरानी हुई कि उस व्यक्ति को अदालत से बाहर एक खिड़की के पीछे दीवार से परे खड़ा रहना पड़ा और वह अन्दर नहीं आता था, क्योंकि उसने कहा ‘‘जहां तक आपका संबंध है, यह ठीक है, लेकिन मैं अदालत के भीतर आ गया, तो आपके जाने के बाद मेरा सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाएगा’’।

  1. वह मुवक्किल था जो भीतर नहीं आना चाहता था?

डॉ. अम्बेडकर : जो अन्दर आने की हिम्मत ही नहीं कर पा रहा था।

  1. वह किस प्रकार के सामाजिक बहिष्कार की बात सोच रहा था?

डॉ. अम्बेडकर : सामाजिक बहिष्कार ऐसा होता है कि यदि वह गांव में जाता, तो उसका बहिष्कार कर देते। कोई उसे अनाज नहीं देता। गांव वाले उसे उसकी सेवाओं का कोई मेहनताना नहीं देते। उसे गांव में घुसने ही नहीं दिया जाता। दलित वर्गों के लोग गांव की सीमा पर ही रहते हैं, बीच में नहीं।

  1. आपका कहना है कि वह मौके पर अदालत आने से डरता था, क्योंकि वह सोचता था कि बाद में गांव के उसकी अपनी जाति के लोग नहीं, सवर्ण लोग, यह कहेंगे कि वह वहां चला गया, जहां उसे नहीं जाना चाहिए था।

डॉ. अम्बेडकर : निश्चित रूप से। क्योंकि उसका यह काम उसकी सामाजिक हैसियत से परे होता।

  1. यह ऐसा एक ही मामला है। क्यों?

डॉ. अम्बेडकर : यह मेरा अपना अनुभव है। परन्तु मेरे विचार में बम्बई उच्च न्यायालय के इस आशय के परिपत्र से कि दलित वर्गों के लोगों को अदालतों में आने दिया जाए, लगता है कि ऐसी बात कभी कभार ही होती है। उस परिपत्र का भी कोई कारण होगा।