भारतीय सांविधिक आयोग के समक्ष
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जाए, इसके पचड़े में मैं नहीं पड़ना चाहता। मेरे विचार में प्रत्येक व्यक्ति के पास यह समझने की बुद्धि है कि उसे वास्तव में क्या चाहिए। साक्षरता का इससे कोई सरोकार नहीं। कोई व्यक्ति अनपढ़ होने के बावजूद बहुत बुद्धिमान हो सकता है।
- क्या आप ऐसा नहीं समझते हैं कि इस पृथक प्रतिनिधित्व से सांप्रदायिक तनाव बढ़ेगा? यह कहा जाता है कि सांप्रदायिक तनावों का कारण पृथक प्रतिनिधित्व और पृथक निर्वाचक - मंडल है। क्या आप का ऐसा विचार है?
डॉ. अम्बेडकर : यदि मान भी लें कि इससे तनाव बढ़ेगा, परन्तु फिर भी मेरे विचार में आप इससे छुटकारा नहीं पा सकते।
इससे तनाव उत्पन्न होता है, यह विवादास्पद है, परन्तु मेरी समझ में यह नहीं आता कि इससे कैसे छुटकारा पाया जा सकता है, जब कि हमारा समाज जातियों और संप्रदाय में बंटा है।
- क्या आप नहीं समझते कि तनाव का यही मुख्य कारण है?
डॉ. अम्बेडकर : मैं ऐसा नहीं समझता, परन्तु मैं इतना कहूंगा कि सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व के कारण संप्रदायों के मुखिया समझौतों के लिए अपेक्षाकृत कम तैयार होते हैं। यह मेरा विचार है, किन्तु मैं ऐसा नहीं सोचता कि इससे सांप्रदायिक दंगे होते हैं। मेरे ख्याल से इनका कोई और कारण है।
- सैयद भराम मोहम्मद शाह : क्या आप ऐसा सुझाव नहीं देंगे कि सरकारी लोगों को हटाकर और सरकारी लोगों को मनोनीत किया जाए?
डॉ. अम्बेडकर : मैं मनोनयन नहीं चाहता।
- मेजर ऐटली : क्या उद्योगों, कपड़ा मिलों आदि में दलित वर्गों के लोग काम कर रहे हैं?
डॉ. अम्बेडकर : सर्वत्र दलित वर्गों के सभी लोग श्रमिक हैं।
- आप मेरी बात नहीं समझे। मैं उद्योगों की बात कर रहा हूँ दलित वर्गों के लोग अधिकांशतः गांवों में किन्हीं धन्धों में लगे होते हैं, परन्तु क्या दलित वर्गों की बड़ी संख्या उद्योगों में कार्यरत है?
डॉ. अम्बेडकर : उनकी संख्या बहुत अधिक है।
- बंबई जैसे शहर में भी उनकी संख्या अधिक है क्या?
डॉ. अम्बेडकर : जी, हां।
- क्या वे यहां आने पर किसी सीमा तक अस्पृश्य नहीं रहते?
डॉ. अम्बेडकर : जी, नहीं। मैं यह बता दूं कि दलित वर्ग के व्यक्ति को बुनाई विभाग में, जहां सबसे अधिक पैसा मिलता है, नहीं रखा जाता। उसे केवल कताई और अन्य विभागों में रखा जाता है।
- क्यों?