188 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
विभाग में अस्पृश्यों को न आने देना चाहते हों, इस आशंका से कि उनकी सस्ती मजदूरी के कारण उनके विभाग में भी मजदूरी कम न कर दी जाए।
डॉ. अम्बेडकर : जी नहीं, मजदूरी के आधार पर भेदभाव नहीं है।
- क्या मजदूरी का इससे कोई सरोकार नहीं है?
डॉ. अम्बेडकर : बिल्कुल नहीं।
- क्या यह केवल अस्पृश्यता का ही प्रश्न है?
डॉ. अम्बेडकर : जी हां।
- श्री कैडोगन : वे श्रमिक संघों के सदस्य बन सकते हैं?
डॉ. अम्बेडकर : जी हां।
- श्री प्रेमचन्द : क्या मुझे आप उन वर्गों की निश्चित परिभाषा बता सकते हैं, जो मतदाताओं के विशेष रजिस्टर में दलित वर्गों के रूप में दर्ज होंगे?
डॉ. अम्बेडकर : जिन जातियों के स्पर्श मात्र से लोग अपवित्र हो जाते हैं।
- क्या यह सिद्धान्त न्यायसंगत है कि जो जाति जितनी ही नीची स्थिति में होगी, उसको अन्य जातियों की अपेक्षा चुनाव में उतना ही अधिक लाभ मिलना चाहिए?
डॉ. अम्बेडकर : जी हां।
- यदि सभी अल्पसंख्यकों को अतिरिक्त सीटें दे दी जाएं, तो फिर बहुमत किसका होगा?
डॉ. अम्बेडकर : यदि अल्पसंख्यक एकजुट होकर बहुमत में आ जाते हैं, तो फिर बहुमत का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। अल्पसंख्यकों में भी वर्गभेद होंगे। मैं बता सकता हूँ कि बंबई प्रेसिडेंसी में मुसलमान भी दो वर्गों में बंटे हैं, एक पूंजीपतियों का पक्षधर है, दूसरा श्रमिकों का।
- क्या यह सच नहीं है कि जिन लोगों की राजनीतिक सोच नहीं है या जिन्हें राजनीतिक प्रशिक्षण नहीं मिला है, उन्हें पेशेवर नेता प्रायः बरगला देते हैं?
डॉ. अम्बेडकर : मुझे पता नहीं। मैं कभी पेशेवर राजनेता नहीं रहा। इसलिए मैं कुछ नहीं कर सकता हूँ।
- क्या समाज के अशिक्षित वर्ग के एक बड़े भाग को मताधिकार देने में कोई
खतरा नहीं है और क्या इसका दुरुपयोग होने की संभावना नहीं है?
डॉ. अम्बेडकर : जी नहीं, मैं ऐसा नहीं समझता।
- क्या आप मुझे बता सकते हैं कि दलित वर्गों के लोगों को अपने वर्तमान स्कूलों और कालिजों में प्रांत के राजस्व पर प्रभाव की आवश्यकता के बिना दाखिला कराना क्यों संभव नहीं है।
डॉ. अम्बेडकर : क्योंकि वर्तमान व्यवस्था में उनकी घोर उपेक्षा हो रही है।