घ. भारतीय सांविधिक आयोग के समक्ष - Page 211

194 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

नेशन्स में अपील करने का अधिकार है।

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  1. मेरी सिद्धान्त से कोई लड़ाई नहीं है?

डॉ. अम्बेडकर : और मैं यह कह दूं कि स्वरूप के बारे में मेरा कोई विशेष आग्रह नहीं है।

  1. आपने जो योजना बताई है, उसे यदि इस देश के संविधान में शामिल कर लिया लाये, तो इससे एक स्थाई वर्ग - संघर्ष नहीं छिड़ जाएगा?

डॉ. अम्बेडकर : हो सकता है, पर वह बहुसंख्यकों के रवैय पर निर्भर होगा।

  1. अतः एक दूरदर्शी राजनेता के रूप में आप इसके लिए आग्रह नहीं करेंगे?

डॉ. अम्बेडकर : वास्तव में ये सब प्रावधान, यद्यपि मैं उन पर आग्रह करता हूँ, अस्थ­ ाई होंगे, मैं सोचता भी हूं और इसकी इच्छा भी रखता हूँ कि एक ऐसा समय आएगा, जब भारत अखंड होगा और मैं समझता हूँ कि उस समय ये सब बातें जरूरी नहीं हांगी परन्तु यह अल्पसंख्यकों के प्रति बहुसंख्यकों के दृष्टिकोण पर निर्भर करेगा।

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  1. अभी आपने एक मुकदमें का जिक्र किया, जिसमें आपने दलित वर्ग के एक ऐसे सदस्य की पैरवी की, जो सामाजिक बहिष्कार के डर से खिड़की के बाहर खड़ा रहा। वह कौन सा जिला था?

डॉ. अम्बेडकर : खानदेश जिला।

  1. सामान्य मजिस्ट्रेट की अदालत?

डॉ. अम्बेडकर : वृत्तिभोगी मजिस्ट्रेट की अदालत।

  1. मजिस्ट्रेट की जाति क्या थी?

डॉ. अम्बेडकर : हिन्दू।

  1. उसने अभियुक्त के अदालत में आने पर आपत्ति नहीं की?

डॉ. अम्बेडकर : जी नहीं, मैंने कहा कि अभियुक्त स्वयं अंदर नहीं आया।

  1. अभियुक्त हिन्दुओं के पिछले कारनामों से डरा हुआ था?

डॉ. अम्बेडकर : जी, हां।

  1. सवर्ण हिन्दुओं द्वारा किए गए दमन के कारण दलित वर्गों में यह डर धर कर गया है कि यदि वे उन सीमित अधिकारों को, जो सवर्ण हिन्दुओं ने उन्हें दिए हैं, लांघ देंगे तो उनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं होगा?

डॉ. अम्बेडकर : जी, हां।

  1. माननीय हरिसिंह गौड़ : डॉ. अम्बेडकर, शायद आप इस बात को स्वीकार करेंगे कि पिछले कुछ वर्षों में अस्पृश्यता उन्मूलन के लिए और दलित वर्गों की सभी