भारतीय सांविधिक आयोग के समक्ष
असुविधाओं को दूर करने के लिए एक अभियान चलाया गया है?
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डॉ. अम्बेडकर : जी, हां।
- मैं स्वीकार करता हूँ कि सुधार आपकी इच्छा और कल्पनाओं के अनुरूप नहीं है, परंतु साथ ही हमें मानना पड़ेगा कि यह भावना बढ़ती जा रही है कि उन सभी अवरोधों को तोड़कर, जो सवर्ण और असवर्ण हिन्दुओं के बीच खड़े हैं, एक संगठित हिन्दू समाज बनाया जाए। आप ऐसा मानते हैं?
डॉ. अम्बेडकर : हां, मंचों से ऐसे भाषण होते हैं।
- कुछ ठोस कार्य हुए हैं?
डॉ. अम्बेडकर : बंबई प्रेसिडेंसी में जहां मैं रहता हूँ, वहां के बारे में तो मुझे आपकी बात स्वीकार करने में संकोच है।
- इसलिए मैं आपको उदाहरण दूंगा। हर साल, जहां भी सवर्ण और गैर सवर्ण जातियां हैं, हिन्दू वर्ष में एक बार सहभोज की व्यवस्था करते हैं। तब वे सभी एक साथ बैठकर खाना खाते हैं, ताकि एक जाति के लोग दूसरी जाति से घुल-मिल सकें।
डॉ. अम्बेडकर : इस प्रेसिडेंसी में ऐसी किसी बात का मुझे पता नहीं है।
- मैं ऐसे कई अवसरों में शामिल हुआ हूँ।
डॉ. अम्बेडकर : इसी प्रेसिडेंसी में?
माननीय हरिसिंह गौड : नहीं, नागपुर में।
- यहां ऐसा नहीं होता?
डॉ. अम्बेडकर : जी नहीं।
- परन्तु आप मानते हैं कि यह बात मानी जाने लगी है कि दमन और अस्पृश्यता समाप्त होने चाहिएं और इस संबंध में किए गए प्रत्येक प्रयास पर सवर्ण हिन्दू और विशेष रूप से सुधारक वर्ग सहानुभूतिपूर्वक विचार करता है?
डॉ. अम्बेडकर : मुझे फिर भी इसका उत्तर देने में संकोच है।
- चैयरमेन : इस साक्षी के विचार जानने के लिए क्या आप मेरे दो या तीन प्रश्नों का उत्तर देंगे?
माननीय हरिसिंह गौड़ : जी हां, निस्संदेह।
चेयरमैन : इसके लिए श्री राजा कई तरह से सर्वोत्तम व्यक्ति होंगे, परन्तु मैं चाहता हूँ कि आप हमें अपने विचार बताएं। बंबई प्रेसिडेंसी की बीस साल पहले से तुलना करें, आप यहां पर कितने साल से हैं?
डॉ. अम्बेडकर : पांच या छह साल से।
- वैसे वास्तव में बहुत पहले से ही आप केवल अपने ही समुदाय में रुचि लेते रहे हैं?
डॉ. अम्बेडकर : जी, हां।