भारतीय सांविधिक आयोग के समक्ष
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डॉ. अम्बेडकर : इस संबंध में कुछ सुधार हुआ है।
- मुझे यह सुनकर प्रसन्नता हुई। 20 वर्ष पूर्व यदि कोई स्वर्ण हिन्दू किसी अस्पृश्य के निकट संपर्क में आता था, तो वह अपने आपको शुद्ध करना अपना धार्मिक कर्तव्य समझता था, परन्तु अब ऐसी बात नहीं है?
डॉ. अम्बेडकर : जी हां।
- अब सचमुच यदि 20 वर्ष पहले से तुलना की जाए, तो मैं सोचता हूँ कि दलित वर्गों के कुछ लोग व्यावसायिक दृष्टि से काफी ऊंचे उठ गए हैं। बीस साल पूर्व क्या कोई दलित बंबई में वकालत कर सकता था?
डॉ. अम्बेडकर : जी नहीं।
- इस समय दलित वर्गों के कितने लोग वकालत कर रहे हैं?
डॉ. अम्बेडकर : मैं ही अकेला व्यक्ति हूँ।
- मेरे विचार में हमें कल बताया गया था कि सरदारों और इनामदारों की मतदाता सूची में दलित वर्गों के दो सदस्य हैं?
डॉ. अम्बेडकर : केवल एक है। उसकी स्थिति भिन्न है। उसे पेशवाओं ने रणक्षेत्र में की गई सेवाओं के लिए जागीर दी थी। ब्रिटिश सरकार ने उसे यह पट्टा नहीं दिया।
- हम देखते हैं कि भारत में शहरों और गांवों के बीच बसें चल रही हैं तथा इनमें दलित वर्गों के लोग चढ़ सकते हैं?
डॉ. अम्बेडकर : गांवों में नहीं। बहुत सारे ऐसे गांव हैं, जहां दलित वर्गों के लोगों को इनमें नहीं चढ़ने दिया जाता है।
- उन्हें कौन रोकता है?
डॉ. अम्बेडकर : ड्राईवर उन्हें नहीं चढ़ाता।
- ड्राईवर तो उसी को चढ़ाएगा जो पैसा देगा। वह उन्हें क्यों नहीं चढ़ाता?
डॉ. अम्बेडकर : क्योंकि यदि वह उन्हें चढ़ाता है, तो और सवारियां नहीं आएंगी। उदाहरण के लिए नाई मेरी हजामत नहीं बनाएगा, भले ही मैं उसे एक रुपया दूं।
- राव साहेब पाटिल : यह कानून है कि यदि ड्राईवर किसी सवारी को नहीं चढ़ाता है, तो उस पर मुकदमा चलाया जा सकता है?
डॉ. अम्बेडकर : वे यह कह कर बच जाते हैं कि सभी सीटें भर गई हैं।
- क्या इस मामले में कोई सुधार हो रहा है?
डॉ. अम्बेडकर : हां, सुधार हो रहा है, फिर भी ऐसे अनेक मामले हैं, जहां दलित वर्गों को इन बसों में नहीं चढ़ने दिया जाता?
- अब हम दलित वर्गों के उन लोगों के मामले को लेते हैं, जो बंबई की मिलों में काम कर रहे हैं। उनमें से कुछ ट्रामों में जाते हैं। क्या आप यह कहना चाहते हैं कि उन्हें ट्रामों में यात्रा नहीं करने दी जाती है?
डॉ. अम्बेडकर : दो साल पहले एक ऐसा मामला हुआ था, जब एक भंगी को ट्राम