घ. भारतीय सांविधिक आयोग के समक्ष - Page 217

200 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

जब मैंने उनके विरोध का आधार जानने की कोशिश की तो मुझे पता चला कि वे चाहते हैं कि दलित वर्गों के लोग गन्दे कामों में लगे रहें, क्योंकि यदि वे इन गन्दी आदतों को छोड़ देंगे, तो वे अपनी सामाजिक हैसियत का अतिक्रमण करेंगे और ऊंची जातियों के प्रतिद्वन्द्वी बन जायेंगे। उदाहरण के लिए कोलाबा और रत्नागिरी जिलों में पूरे महार समुदाय ने मृत पशओं का मांस खाना छोड़ दिया, परन्तु उन पर किए जा रहे अत्याचार और सामाजिक दमन अकथनीय हैं। उनका पूर्ण सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार किया गया है। जिस जमीन पर वे वर्षों से खेती कर रहे थे, वह सवर्ण हिन्दू जमींदारों ने उनसे छीन ली है। उन पर सामाजिक और आर्थिक हर प्रकार का दबाव डाला जाता है, ताकि वे पहले की तरह अपनी गंदी आदतों को बनाए रखें। अधिकारी लोग, जो सभी सवर्ण हिन्दू जातियों के हैं, दलित वर्गों को कोई संरक्षण नहीं देते। इससे दलित वर्गों की दशा वास्तव में दयनीय हो गई है और यह सब इसलिए हुआ कि वे अपनी पुरानी गंदी आदमों को छोड़ना चाहते थे। मैंने पाया कि ऊंची जातियों के लोग मेरे साथ सहयोग करने के बजाय मेरे विरुद्ध हो गए और कहने लगे कि ‘‘दलित वर्गों’’ की ये बुरी आदतें उनकी हीन भावना की परिचायक हैं और उनकी ये बुरी आदतें बनी रहनी चाहिएं।

  1. कुछ दिन पहले एक साक्षी ने बताया कि स्वच्छता बोर्डों में दलित वर्गों का एक भी सदस्य नहीं है। यदि ऊंची जातियों के बारे में, आपने जो कहा है, वह सही है, तो क्या दलित वर्गों के लोगों को इन बोर्डों में रखने से कोई लाभ होगा?

डॉ. अम्बेडकर : मेरा कहना है कि दलित वर्गों का प्रतिनिधित्व प्रत्येक स्थानीय प्राधिकरण में होना चाहिए।

  1. आपने अभी बताया कि इस प्रेसिडेंसी की अदालतों में दलित वर्गों के गवाह पहुंच नहीं सकते हैं। मैं इस बात को स्पष्ट करना चाहता हूँ। क्या आपके कहने का अभिप्राय है कि दलित वर्गों के लोगों को कुछ अदालतों में घुसने नहीं दिया जाता?

डॉ. अम्बेडकर : जी हां।

  1. और मैं समझता हूँ कि आपने यही कहा था कि वह व्यक्ति अदालत में घुसने का साहस नहीं जुटा सका। यही बात है ना?

डॉ. अम्बेडकर : तथ्य यह है कि सवर्ण लोग दलित वर्गों को हेय दृष्टि से देखते हैं। दलित वर्गों का समाज में एक निर्धारित स्थान है। यदि वे अदालत में जाते हैं, तो अपने उस निर्धारित स्थान से बाहर आने की कोशिश करते हैं। यदि वे ऐसा करते हैं तो सवर्ण लोग उन्हें तंग करेंगे। यदि कोई व्यक्ति अपनी सामाजिक सीमा को लांघता है, तो सवर्ण लोग उसे परेशान करते हैं। उस मामले में उसे जो संरक्षण प्रदान किया गया था, वह थोड़ी देर के लिए था और उसे मालूम था कि मुकदमा समाप्त होते ही उसका वह संरक्षण भी समाप्त हो जायेगा।

  1. यदि आप वहां नहीं होते और वह अदालत में घुसने की कोशिश करता, तो उसके साथ क्या व्यवहार होता?