परिच्छेद I
प्रांत के क्षेत्र का पुनर्वितरण
बंबई प्रेसिडेंसी का क्षेत्रफल लगभग 1,223,541 वर्ग मील है। इसे चार स्पष्ट भाषायी खंडों में बांटा जा सकता है। वे हैं : (1) महाराष्ट्र, (2) गुजरात, (3) कर्नाटक, और (4) सिंध। इन खंडों के लोग काफी अर्से तक एक ही प्रशासन के अधीन एक - दूसरे से जुड़े रहे हैं। गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक पिछले 110 वर्ष से बंबई प्रेसिडेंसी के अंग रहे हैं, जबकि सिंध को प्रेसिडेंसी में 85 वर्ष पहले मिलाया गया था। इस संघ में से अब कर्नाटक और सिंध प्रेसिडेंसी से अलग होने की मांग कर रहे हैं। अलग होने के लिए दलील यह दी गई है कि प्रांत प्राकृतिक इकाई नहीं है। यह जातीय या भाषायी एकता की कसौटी पर भी खरा नहीं उतरता और वस्तुतः समजातीय समूहों को जानबूझ कर तोड़कर तथा उन्हें विषय जातीय समूहों से जोड़ कर इसे बनाया गया है। इसे एक बुराई कहा गया है। इस बात पर जोर देकर कहा गया कि प्रांतों के टुकड़े करके उनकी विशिष्ट संस्कृतियों का गला घोंट दिया गया है और दूसरे बड़े समूहों के साथ मिला कर उन्हें राजनीतिक रूप से पंगु बना दिया गया है।
इसमें कोई शक नहीं कि कर्नाटक के मामले में इस दलील में कुछ बल है। यह सच है कि प्रशासन की दृष्टि से कर्नाटक के कई छोटे - छोटे भाग करके उन्हें गैर - कर्नाटक क्षेत्रों से मिला दिया गया है और इस तरह उनका अलगाव हो गया है। इस बात का भी खंडन नहीं किया जा सकता कि कर्नाटक का जो भाग बंबई प्रेसिडेंसी से मिलाया गया है, उसे बंबई विधान परिषद में उचित प्रतिनिधित्व न मिलने के कारण राजनीतिक रूप से हानि हुई है। यह सब तो है ही, इसके अलावा भी मैं बंबई प्रेसिडेंसी से कर्नाटक के अलग होने का विरोध करता हूँ। ‘एक भाषा एक प्रांत’ का सिद्धांत इतना बड़ा है कि इसे व्यावहारिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता। इस सिद्धांत को यदि लागू किया जाए, तो बहुत से प्रांत बनाने पड़ेंगे और उससे सिद्ध हो जाता है कि वह व्यवहार योग्य नहीं है। यदि केवल “जहाँ भाषा स्पष्ट सांस्कृतिक भाषा है, जिसका अपना अतीत और भविष्य है” और “जहाँ सशक्त भाषायी चेतना विद्यमान है” जैसे सिद्धांत पर चलें, तो भी इसे व्यवहार्य नहीं बनाया जा सकता। कारण यह है कि प्रत्येक ऐसी भाषा को जिसका अपना उज्ज्वल अतीत रहा है, यदि अवसर दिया जाए, तो उसका भविष्य भी उज्ज्वल होगा और यदि प्रत्येक भाषायी समूह को