1. प्रांत के क्षेत्र का पुनर्वितरण - Page 23

6 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

शासन सत्ता सौंपी जाए, तो उसमें भाषायी चेतना पैदा हो जाएगी। मैं जानता हूं कि शायद इसके कारण कन्नड़ संस्कृति की बलि देनी पड़े, यद्यपि मुझे विश्वास नहीं है कि मौजूदा व्यवस्था को बनाए रखने का यह परिणाम होगा ही। लेकिन यदि यही परिणाम हो तो भी मेरे विचार से अफसोस की कोई बात नहीं है, क्योंकि मेरी राय है कि आज वक्त का सबसे बड़ा तकाजा यह है कि जनता-जनार्दन के मन में एक साझी राष्ट्रीयता की भावना पैदा की जाए। यह भावना नहीं चलेगी कि पहले वे भारतीय हैं और फिर हिंदू, मुसलमान या सिंधी और कन्नड़ हैं, बल्कि यह कि वे मूलतः भारतीय हैं और अंततः भारतीय ही हैं। यदि हमारा आदर्श यही है, तो ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए, जिससे स्थानीय देशभक्ति और वर्गचेतना की भावना को कट्टरता का रूप मिले। प्रांत के मौजूदा विषमजातीय स्वरूप के पक्ष में बात यह है कि यह बहुभाषी लोगों को भागीदारी के समान अवसर प्रदान करता है। इससे तो अलगाववादी भावना के प्रसार पर काफी हद तक अंकुश लगेगा ही। मेरा विचार है कि जिस व्यवस्था का परिणाम ऐसा लाभप्रद हो, उसे बनाए रखना चाहिए। अतः मैं कर्नाटक की अलग होने की मांग का विरोध करता हूँ।

  1. मेरे साथियों ने कर्नाटक के अलग होने के दावे को सरसरी तौर पर इसलिए

खारिज कर दिया कि कोई गवाह इसके समर्थन में सम्मेलन के सामने नहीं आया। मुझे इसके बारे में कोई अफसोस नहीं है, क्योंकि इस विषय पर मैं अपने साथियों की सिफारिश से सहमत हूँ। लेकिन हैरानी इस बात की है कि सिंध के बारे में मेरे साथियों का निष्कर्ष अलग है। मेरी राय में कर्नाटक की तुलना में सिंध का कोई मामला नहीं बनता। इस बारे में दो राय नहीं हो सकती कि बंबई प्रेसिडेंसी में शामिल होने से सिंध को काफी लाभ हुआ है। काफी दूरी होने के बावजूद सिंध को परिवार के गौण सदस्य का दर्जा देने के बदले अति सम्मानजनक शर्तों पर एक पड़ोसी का ऊँचा दर्जा दिया गया है। सिंध के प्रशासनिक कार्यों की देखरेख एक कमिश्नर करता है, जिसका पद लगभग गवर्नर जैसा है। अतः कहना पड़ेगा कि सिंध ने अपनी स्वतंत्रता की गरिमा बनाए रखी है। उसे अपनी पुरानी और परंपरागत विधि संहिता बनाए रखने की अनुमति दी गई है। केवल प्रेसिडेंसी के लिए पास किया गया कोई भी नया कानून शायद ही कभी सिंध पर लागू किया गया हो, जब तक कि वह उसके लिए विशेष रूप से लाभकारी न समझा गया हो। सिंध के ट्रिब्यूनल प्रेसिडेंसी के ट्रिब्यूनलों के अधीन नहीं है। वे पूर्णतः स्वतंत्र हैं। उसकी लोक सेवा प्रेसिडेंसी की लोक सेवा से वस्तुतः अलग है और उसमें सिंध के ही लोग हैं। यह नहीं कहा जा सकता कि प्रेसिडेंसी के साथ जुड़ने से उसे कोई आर्थिक हानि हुई है। इसके विपरीत वह प्रेसिडेंसी के सहारे इतनी तेजी से तरक्की करने में समर्थ हुआ है, जितनी वह अपने बलबूते पर नहीं कर सकता था। प्रेसिडेंसी के साथ मिलने से ही वह उसके विशाल संसाधनों का इतना प्रचुर उपयोग भी कर सका है। सरकार ने भी सिंध की ओर पूरा - पूरा ध्यान दिया है,