दलित वर्गों संबंधी भारतीय मताधिकार कमेटी
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की डोर से गुथे हुए नहीं हैं। संचार व्यवस्था के अभाव के कारण हर प्रांत में उसकी अपनी निजी शैली के अनुसार उसके सामाजिक जीवन की विशिष्ट रीति-रिवाजों और पद्धतियों का विकास हुआ है। इन परिस्थितियों में समूचे भारत में अस्पृश्यता की अधिकांश कसौटियों को जितनी एकरूपता के साथ लागू होते हुए पाया जाता है, वह वास्तव में उल्लेखनीय है, यथा, मंदिर में प्रवेश पर रोक भारत में सर्वत्र लगी हुई है। कुएं से पानी लेने और स्पर्श से अपवित्र होने की कसौटियां भी हर प्रांत पर लागू होती हैं। भले ही सर्वत्र समान कठोरता नहीं है, लेकिन अस्पृश्यता जैसी प्रणाली तो बहरहाल सामाजिक व्यवहार का मामला है। अतः वह हर प्रांत, हर व्यक्ति की परिस्थितियों के अनुसार बदलेगी ही। ऐसी प्रणाली में पूर्ण एकरूपता का आग्रह करना केवल समस्या के साथ खिलवाड़ करना होगा। सांविधिक आयोग इस प्रकार के तर्क की संभावना के प्रति पूर्णतः सजग था। उसने सावधानी से विचार करने के बाद इसे अस्वीकार कर दिया और अस्पृश्यता की कसौटियों को लागू करने में विविधता के सिद्धान्त को मान्यता दी। खंड 2 के पृष्ठ 67 पर अपनी सिफारिशों में उसने कहा, ‘‘जब नई प्रतिनिधित्व प्रणाली के मुख्य सिद्धान्त निश्चित कर लिए जाएंगे, तो उसके बाद स्पष्ट है कि यह आवश्यक होगा कि (पूर्ववर्ती मताधिकार कमेटी जैसी) किसी विशेषतः नियुक्त निकाय को नए निर्वाचन नियमों को तैयार करने का काम सौंपा जाए, ताकि इन सिद्धान्तों को अमल में लाया जा सके। ऐसे निकाय का एक काम यह होगा कि वह हर प्रांत के लिए दलित वर्गों की परिभाषा तैयार करे (जो कभी-कभी तो एक ही प्रांत के भागों के बीच भी बदल सकती है) और ऐसी परिभाषा के अनुसार उनकी संख्या निश्चित करें। एक और बात पर भी मैं जोर देना चाहता हूँ और वह यह है कि समूचे भारत पर अस्पृश्यता की एकरूप कसौटियों को लागू करने का आग्रह व्यर्थ है। यह मान लेना एक बुनियादी गलती होगा कि अस्पृश्यता की कसौटियों के विभेद अस्पृश्यों की परिस्थितियों के विभेद की ओर संकेत करते हैं। वे जिस मनोवृति की ओर इंगित करते हैं, उसके सही विश्लेषण से पता चलेगा कि चाहे कसौटी स्पर्श से भ्रष्ट करने की है अथवा सांझे कुएं से पानी लेने की अस्वीकृति की है, दोनों में निहित भावना एक ही है। दोनों संकीर्णता, घृणा, द्वेष और अपमान की एकसी आन्तरिक भावना की बाह्य अभिव्यक्तियां हैं। अस्पृश्य को हिन्दू स्पर्श क्यों नहीं करेगा? किस कारण अस्पृश्य को हिन्दू मंदिर में प्रवेश करने अथवा गांव के कुएं के इस्तेमाल की अनुमति नहीं देगा? किस कारण अस्पृश्य को हिन्दू सराय में प्रवेश नहीं करने देगा? इनमें से हर प्रश्न का उत्तर एक जैसा है। वह है कि अस्पृश्य एक गन्दा व्यक्ति है और इसके साथ सामा जिक संपर्क नहीं किया जा सकता। अतः किस कारण एक ब्राह्मण किसी अस्पृश्य के धार्मिक अनुष्ठान में पुरोहित नहीं बनेगा? किस कारण एक नाई अस्पृश्य की सेवा नहीं करेगा? इन मामलों में भी उत्तर एक जैसा है। वह है कि ऐसा कर्म अपमानजनक है। यदि हमारा उद्देश्य उस वर्ग के लोगों का पता लगाना है जो सामाजिक घृणा से त्रस्त हैं, तो यह बात नगण्य है कि हम कौन-सी कसौटी लागू करते हैं, क्योंकि जैसा कि