च. दलित वर्गों संबंधी भारतीय मताधिकार कमेटी - Page 225

208 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

मैं बता चुका हूँ, इनमें से हर एक कसौटी यही बताती है कि अस्पृश्यों के प्रति स्पृश्यों की सामाजिक मनोवृति एक जैसी है।’’

  1. दूसरा दृष्टिकोण यह है कि अस्पृश्य वर्गों का पता लगाने के लिए स्पर्श द्वारा अपवित्रीकरण की कसौटी को लागू करते समय निश्यच ही प्रमुखता उसकी शाब्दिक भावना को देनी होगी, न कि धारणात्मक भावना को। शाब्दिक भावना के अनुसार केवल वे व्यक्ति अस्पृश्य हैं, जिनका स्पर्श अपवित्र करता है और परिहार्य है अथवा यदि परिहार्य न हो तो स्नान करके उसे दूर किया जाता है। धारणात्मक भावना के अनुसार अस्पृश्य वह व्यक्ति है जिसे ऐसे वर्ग का समझा जाता है, जिसके बारे में सामान्य धारणा है कि वह स्पर्श से अपवित्र करता है, यद्यपि स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार ऐसे व्यक्ति के संसर्ग को टाला नहीं जा सकता अथवा धार्मिक विधि के अनुसार पवित्रीकरण की आवश्यकता नहीं होती। उन व्यक्तियों के अनुसार, जो शाब्दिक भावना के अनुसार कसौटी को लागू करना चाहते हैं, निष्कर्ष यह होगा कि तथाकथित अस्ृपश्य, अस्पृश्य नहीं माने जाएंगे, जहां कि परिस्थितियां इतनी बदल गई हैं कि लोग अस्पृश्य के स्पर्श से बच नहीं सकते अथवा वे उनके स्पर्श से हुए अपवित्रीकरण से स्वयं को शुद्ध करने की परवाह नहीं करते। मैं इस दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं कर सकता, क्योंकि मेरी राय में वह गलतफहमी पर आधारित है। शब्द की शाब्दिक भावना के अनुसार किसी व्यक्ति को अस्पृश्य विभिन्न परिस्थितियों के कारण नहीं माना जा सकता। फिर भी, ऐसी बाध्यकारी परिस्थितियों की परिधि से बाहर उसे एक अशुद्ध व्यक्ति माना ही होता है, क्योंकि वह अस्पृश्य वर्ग का है। इस विभेद को बिहार तथा उड़ीसा के जनगणना अधीक्षक ने 1921 की अपनी जनगणना रिपोर्ट में भली भांति प्रस्तुत किया है। प्रस्तुत है उसी का निम्न उद्धरण। जातीय नियमों में ढील देने की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा है, ‘‘ऐसी घटनाएं तो हमने केवल उन उच्च तथा अधिक शिक्षित जातियों के बीच देखी हैं, जो उच्च स्थिति प्राप्त करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें वर्ण व्यवस्था के ढहने का लक्षण नहीं माना जाएगा, बल्कि उन्हें तो वर्तमान परिस्थितियों से उनके समंजन का लक्षण माना जाएगा। वही बात निजी संपर्क अथवा खाने - पीने की चीज को छूने संबंधी नियमों के परिवर्तन के बारे में कही जा सकती है [. . .] जमशेदपुर जैसे स्थानों में काम आधुनिक परिस्थितियों में होता है। वहां सभी जातियों के लोग मिल में साथ - साथ काम करते हैं। उन्हें अपने पड़ोसी की जाति के बारे में कोई गलतफहमी नहीं होती। लेकिन चूंकि रोजमर्रा की जिन्दगी के तथ्य इसे संभव नहीं बनाते कि एक सौ वर्ष पूर्व की भांति व्यावहारिक नियमों का पालन किया जाए, अतः यह नहीं मान लेना चाहिए कि अब शुद्ध और अशुद्ध, स्पृश्य और अस्पृश्य का भेदभाव नहीं बरता जाता। एक सवर्ण हिन्दू किसी अस्पृश्य को यह अनुमति नहीं देगा कि वह एक ही चारपाई आदि और उसके साथ बैठे, एक ही हुक्का गुड़गुड़ाए अथवा उसके शरीर, उसकी चारपाई, अथवा कुर्सी या उसके भोजन अथवा पानी को स्पर्श करे। यदि जीवन के तथ्यों का यह सही आंकलन है, तो शाब्दिक भावना और धारणात्मक भावना के अनुसार अस्पृश्यता का