दलित वर्गों संबंधी भारतीय मताधिकार कमेटी
209
विभेद ऐसा विभेद है, जो अंतिम अवस्था के लिए कोई भेद नहीं करता। क्योंकि जैसा कि उद्धरण दर्शाता है, स्थान स्थानों में जहां शाब्दिक भावना के अनुसार अस्पृश्यता समाप्त हो गई है, वहां धारणात्मक भावना के अनुसार वह अब भी बनी हुई है। इसी कारण मेरा आग्रह है कि अस्पृश्यता की कसौटी को निश्चय ही उसकी धारणात्मक भावना के अनुसार लागू किया जाए।’’
- तीसरे इस विचार का व्यापक प्रचार - प्रसार किया जाता है कि अस्पृश्यता तेजी से समाप्त हो रही है। मैं चेतावनी देना चाहता हूँ कि इस दृष्टिकोण को स्वीकार न किया जाए और बताना चाहता हूँ कि यह आवश्यक है कि तथ्य और प्रचार में भेद किया जाए। जब यदा - कदा ब्राह्मणों और अब्राह्मणों, स्पृश्यों और अस्पृश्यों के आपसी मिलन की घटनाओं से निष्कर्ष निकाले जाएं, तो मेरी राय में इस बात को ध्यान में रखना ही चाहिए कि वस्तुतः हिन्दू समाज का इस्पाती ढांचा वर्ण और अस्पृश्यता की व्यवस्था पर टिका हुआ है। इस विभाजन को सहज ही केवल इस सहज तर्क के आधार पर नहीं मिटाया जा सकता कि व हकिसी तर्कसंगत, आर्थिक, अथवा जातीय आधार पर नहीं टिका है। दूसरी ओर इस बात की संभावना है कि अस्पृश्यता किसी आशावादी सुधारक की आशा से भी अधिक देर तक भविष्य में भी बनी रहेगी। इसका कारण यह है कि उसका आधार धार्मिक रूढि़ है। अस्पृश्यता की रूढि़ के पीछे जो धार्मिक मान्यता है, वह उसे समाप्त करने में बाधक सिद्ध होती है। जो भी हो, सामान्य हिन्दू उसे अपने धर्म का अंग समझता है और इसमें कोई संदेह नहीं कि अस्पृश्यों के प्रति वह जो अमानवीय समझा जाने वाला व्यवहार अपनाता है, उसके पीछे सोची समझी क्रूरता की अपेक्षा धर्मपालन की भावना की प्रधानता रहती है। धर्मप्रायण सामान्य हिन्दू अस्पृश्यता के नियमों में ढील केवल वहीं देता है, जहां वह उनका पालन नहीं कर सकता। वह कभी भी उनका परित्याग नहीं करता। उसकी दृष्टि में अस्पृश्यता का परित्याग का अर्थ है, उसके तथा हिन्दुओं द्वारा मान्य हिन्दू धर्म के मूल धार्मिक सिद्धान्तों का पूर्णतः परित्याग। अस्पृश्यता धर्म पर टिकी है। अतः वह टिकी रहेगी, जैसाकि सभी धार्मिक धारणाएं टिकी रहती हैं। भारतीय इतिहास साक्षी है कि अनेक महात्माओं ने भारत भूमि से अस्पृश्यता को समूल नष्ट करने के प्रयास किए हैं। उनमें बुद्ध, रामानुज और वैष्णव संत जैसे महापुरुष भी शामिल हैं। यह मान लेना खतरनाक होगा कि जिस पद्धति ने ऐसे सभी प्रहारों को झेल लिया है, अतः मेरा विचार है कि जब तक यह धारणा बनी रहेगी, तब तब अस्पृश्यता भी बनी रहेगी।
अस्पृश्यता की रूढि़ की व्याख्या और व्याप्तियों के संबंध में सामान्य प्रश्नों से संबद्ध अपने विचार मैं स्पष्ट कर चुका हूँ। अब मैं उन तीन प्रान्तों में जहां मतैक्य नहीं है, दलित वर्गों की संख्या के प्रश्न पर कुछ विचार प्रकट करना चाहूंगा।