दलित वर्गों संबंधी भारतीय मताधिकार कमेटी
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है कि उनका और भी घनिष्ठ संबंध है। कहा जाता है कि वहां कोरी चमार के अलावा कोई चमार नहीं है। लेकिन कोरी चमार स्वयं को चमार नहीं कहता और स्वयं को शुद्ध और सहज कोरी के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास करता है। वह शब्द का गलत उच्चारण करता है, जो कोइरी जैसा लगता है। जब गोरखपुर जिले में एक खलासी ने शेष हिन्दू नौकरों के साथ चालाकी की और उन्हें अपने हाथ से पानी पिलाया तो उसकी बुरी तरह ठुकाई और पिटाई की गई।’’
अरख समूह के बारे में स्वयं श्री ब्लंट ने अपने टिप्पण में स्वीकार किया है कि ‘‘लगता है समग्रतः ये जातियां प्रमुख पासी जनजाति की ही प्रजातियां हैं’’ और उन्होंने उन्हें अस्पृश्य माना है। जिन कारणों से श्री ब्लंट ने 20,000,00 चमारों के चमार समूह को अस्पृश्यों की श्रेणी से निकाल दिया है, वे उनके टिप्पण के पृष्ठ 17 पर दिए गए हैं। उन्होंने कहा है, ‘‘दूसरी ओर अनेक चमारों ने अधिक स्वच्छ धन्धे अपना लिए हैं, यथा - जिंगार, मोची और साईस के धन्धे। कानपुर और अन्यत्र चमड़े का व्यापार फलाफूला है। उसके फलस्वरूप अनेक चमार पैसे वाले हो गए हैं और उनका लक्ष्य रहता है कि वे अपने गांव के बन्धुओं से अधिक उच्च सामाजिक स्तर प्राप्त कर लें। ऐसे चमारों को प्रायः स्पृश्य माना जाता है। उनमें से अनेक तो अपनी जाति का नाम बदल लेते हैं, जो उतना बुरा नहीं लगता यथा कोरिल, अहरवार, जटिया, धूसिया और विशेषतः जायसवार।’’ मेरे विचार में ऐसे चमारों को जिन्होंने अधिक स्वच्छ धन्धे अपना लिए हैं अथवा जो पैसे वाले हो गए हैं, उन्हें श्री ब्लंट ने अस्पृश्यों की श्रेणी से निकाल कर नितान्त गलत दृष्टिकोण अपनाया है। अस्पृश्यता तथा वर्ण व्यवस्था की एक विशेषता यह है कि किसी व्यक्ति का सामाजिक स्तर उसकी जाति के स्तर के साथ बढ़ता या घटता है। हिन्दू सामाजिक जीवन का सदा ही यह नियम रहा है कि अस्पृश्य सदा सर्वदा अस्पृश्य ही रहेगा। वह उसका मूलाधार है और वही उसका विभेद उस वर्ग पद्धति से करता है, जिसमें किसी व्यक्ति का सामाजिक स्तर उसकी जाति के स्तर के साथ घटता या बढ़ता है, बल्कि उसके अपने गुण दोषों के आधार पर घटता या बढ़ता है। हिन्दू समाज के जीवन के इस मूल तथा बुनियादी सिद्धान्त को ध्यान में रखते हुए श्री ब्लंट के इस विभाजन को अस्वीकार करना ही होगा कि किसी अस्पृश्य मानी जानी वाली जाति के कुछ लोग अस्पृश्य हो गए हैं। वस्तुतः यह एक विसंगत अभिव्यक्ति है और उसका तथ्यों से भी मेल नहीं दीख पड़ता। यह सच नहीं है कि श्री ब्लंट द्वारा उल्लिखित चमार जाति के वर्गों को स्पृश्य माना गया है अथवा वे मंदिर में प्रवेश कर सकते हैं और सार्वजनिक कुओं से पानी ले सकते हैं। इसके विपरीत श्री ब्लंट के कथन के अनुसार उन्होंने अपने लिए नए नाम खोज लिए हैं, ताकि उन्हें अस्पृश्य न समझा जाए। 1911 के लिए संयुक्त प्रांत की अपनी जनगणना रिपोर्ट में भी श्री ब्लंट ने स्वयं इसके उदाहरण दिए हैं। भाग एक से निम्न अंश मैं उद्धृत करता हूँ :