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प्रांत के क्षेत्र का पुनर्वितरण

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जो दिया भी जाना चाहिए था। असल बात यह है कि सुधार लागू होने के बाद से सिंध ने बंबई सरकार पर जितना प्रभाव डाला है वह उसके आकार के अनुपात से बहुत अधिक है। इन तथ्यों को देखते हुए यह समझना मुश्किल है कि सिंध को अलग होने से इससे अधिक और क्या मिलेगा? उसे प्रेसिडेंसी के साथ मिलने से कोई हानि नहीं हुई है और अलगाव के समूचे लाभ मिले हैं।

  1. यह भी स्पष्ट है कि सिंध के सभी संप्रदायों ने मिलकर यह मांग नहीं की है। कमीशन और कमेटी के संयुक्त सम्मेलन के सामने जो सबूत पेश किए गए, उनसे सिंध के मुसलमानों और हिन्दुओं के बीच तीव्र मतभेद का पता चला। जहाँ मुसलमान अलग होने के पक्ष में थे, वहाँ हिन्दू उसका विरोध कर रहे थे। इस प्रश्न पर जब मैंने सिंध के जनमत के इतिहास का अध्ययन किया तो मुझे ज्ञात हुआ कि सिंध के राजनीतिक रूप से प्रबुद्ध लोगों ने सिंध की स्थिति के बारे में केवल 1917 में एकजुट होकर प्रश्न उठाया था। अगस्त 1917 की घोषणा के बाद भावी सुधार योजना में सिंध के स्थान के बारे में विचार करने के लिए नवम्बर 1917 में सिंधियों का एक विशेष सम्मेलन हुआ। सिंध के जाने - माने मुसलमान नागरिक माननीय श्री जी.एम. भुरगरी सम्मेलन की स्वागत समिति के अध्यक्ष थे। सम्मेलन के अध्यक्ष एक हिन्दू सज्जन श्री हरचंदराय विशिनदास थे। सम्मेलन के सामने चार विकल्प थे, अर्थात् : (1) सिंध को अलग प्रांत बनाना, (2) सिंध और बिलोचिस्तान को मिलाकर एक प्रांत बनाना, (3) सिंध को पंजाब के साथ मिलाना, और (4) सिंध का बंबई के साथ ही रहना। यह बात उल्लेखनीय है कि इस विशेष सम्मेलन ने चार विकल्पों में से तीन विकल्प अस्वीकार कर दिए। इनमें से सिंध को अलग प्रांत बनाने का प्रस्ताव भी शामिल था। सम्मेलन ने न केवल अलग प्रांत के प्रस्ताव को ठुकरा दिया, बल्कि हिन्दुओं और मुसलमानों के समर्थन से एक प्रस्ताव भी पास किया। इस प्रस्ताव के अनुसार सिंध के कमिश्नर का दर्जा कम करके उसे प्रेसिडेंसी के डिविज़नल कमिश्नर के बराबर करके सिंध और प्रेसिडेंसी के बीच घनिष्ठ मेल की सिफारिश की गई। हिन्दुओं और मुसलमानों का एक प्रतिनिधिमंडल भारत मंत्री श्री मोन्टेग्यू और वायसराय लार्ड रीडिंग से मिलने गया। कहा जाता है कि प्रतिनिधिमंडल ने जोर देकर कहा कि सिंध अलग प्रांत नहीं बनना चाहता। सम्मेलन के 1918, 1919 और 1920 में हुए बाद के अधिवेशनों में भी दोनों संप्रदायों के सदस्यों ने यही रुख अपनाया। असहयोग आंदोलन की लहर के कारण 1920 के बाद सम्मेलन ने इस प्रश्न पर विचार नहीं किया है। इस विवेचन से स्पष्ट है कि मुसलमानों ने ही अपना रुख बदला है और वे ही स्वीकृत दृष्टिकोण से पीछे हटे हैं। अतः यह मांग संयुक्त मांग न होकर केवल एक वर्ग की मांग है, जो केवल मुस्लिम संप्रदाय द्वारा की गई है।

  2. ऐसी वर्गीय मांग के बारे में सहानुभूतिपूर्वक विचार करने से पहले इस बात की तसल्ली कर लेनी चाहिए कि अलग होने का जो उद्देश्य बताया गया है, वह उचित