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दलित वर्गों संबंधी भारतीय मताधिकार कमेटी

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में वर्गीकृत जातियों की सूची नत्थी की जाती है। उसमें हर जाति की संख्या दी गई है [. . .] अस्पृश्य जातियों के साथ जुड़ी सामाजिक अपवित्रता का अर्थ केवल यह है कि सवर्ण जाति का कोई भी व्यक्ति किसी अस्पृश्य के हाथ से अन्न और जल ग्रहण नहीं करेगा। और यदि वह सवर्ण व्यक्ति को छू लेता है या उसके निकट संपर्क में आ जाता है, तो इससे पहले कि सवर्ण व्यक्ति अन्न ग्रहण करे या उच्च जातियों के लोगों के साथ उठे-बैठे उसे स्नानादि करना ही होगा।’’ इससे यह स्पष्ट हो जाता है 16 मई, 1928 को जब यह ज्ञापन प्रस्तुत किया गया, तो अस्पृश्यता यानी स्पर्श द्वारा अपवित्रीकरण की कसौटी पर आधारित लोगों की संख्या 1 करोड़ 30 लाख थी। यह जाहिर है कि हमारी कमेटी के अध्यक्ष ने जो परिभाषा दी है, वह संयुक्त प्रांत में प्रचलित परिभाषा से और उस परिभाषा से भिन्न नहीं है, जिसके आधार पर संयुक्त प्रांत की सरकार ने 1928 में एक करोड़ तीस लाख की कुल संख्या का आंकलन किया था। अतः मैं इस बात को स्पष्ट करने का भार संयुक्त प्रांत की सरकार पर ही छोड़ना चाहूंगा कि दो आंकलनों के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों है? लेकिन मुझे यह कहना ही पड़ेगा कि संयुक्त प्रांत में अस्पृश्यों के आंकलन के बारे में संयुक्त प्रांत की सरकार ने जो ये परिवर्तन किए हैं, वे दलित वर्गों की प्रतिनिधित्व प्रणाली के बारे में संयुक्त प्रांत सरकार के दृष्टिकोण में किए गए परिवर्तन जैसे ही हैं। 23 अगस्त, 1930 को सांविधिक आयोग की रिपोर्ट पर लिखे गए अपने डिस्पैच में संयुक्त प्रात की सरकार ने दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचक - मंडलों का प्रबलतम समर्थन किया है। हमारी कमेटी को भेजी गई अपनी पहली रिपोर्ट में उस सरकार ने एक तालिका से मनोनयन की सिफारिश की थी जबकि अपनी अंतिम रिपोर्ट उसने सीटों के आरक्षण की सिफारिश की है। इससे तो दलित वर्गों के ध्येय का बेड़ा ही गर्क हो जाएगा, यदि दलित वर्गों की संख्या और उनके प्रतिनिधित्व जैसे दो अति महत्वपूर्ण मसलों के बारे में किसी सरकार के विचारों में ऐसे अजीबोगरीब परिवर्तन आ जाए।

  1. अब मैं संयुक्त प्रांत की प्रांतीय मताधिकार कमेटी के आकलन की चर्चा करूंगा। उसके बारे में मैं निम्न तथ्यों की ओर ध्यान दिलाना चाहूंगा :

(एक) 1928 में जनगणना आयुक्त के, श्री ब्लंट के और सरकार के आंकड़े एक

स्वर से कहते हैं कि दलित वर्ग के लोगों की संख्या यानी स्पर्श से अपवित्र

करने वाले लोगों की संख्या एक करोड़ पन्द्रह लाख और एक करोड़ तीस

लाख के बीच है। अतः इस बात के औचित्य को कमेटी ही सिद्ध करेगी

कि उसने इतना अजीब और कम आंकलन क्यों दिया है?

(दो) मैं कमेटी के इस कथन के प्रति तनिक भी आश्वस्त नहीं हूँ कि दलित

वर्गों के दो सदस्य उसके दृष्टिकोण से सहमत हैं और कमेटी के अधिकांश

सदस्यों का दृष्टिकोण समझौते के सभी निहित अर्थों के बारे में यथोक्त

है। जो भी हो, मैं यह कहना अपना कर्तव्य समझता हूँ कि इस मामले के