च. दलित वर्गों संबंधी भारतीय मताधिकार कमेटी - Page 231

214 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

बारे में बाबू रामचरन की राय का कोई महत्व नहीं है। उनका नाता दलित

वर्ग से केवल इस अर्थ में है कि वह आर्थिक दृष्टि से निर्धन और शैक्षिक

दृष्टि से पिछड़े वर्गों के हैं और शब्द की यथार्थ भावना के अनुसार वह

अस्पृश्य वर्ग के नहीं हैं।

(तीन) भारतीय मताधिकार कमेटी ने अस्पृश्यों के वर्गीकरण के लिए मंदिर - प्रवेश

और स्पर्श द्वारा अपवित्रीकरण की दो कसौटियां अपनाई हैं। संयुक्त प्रांत

की प्रांतीय मताधिकार कमेटी ने केवल एक कसौटी को अर्थात् स्पर्श द्वारा

अपवित्रीकरण की कसौटी को आधार माना है और वह भी उसकी शाब्दिक

भावना के अनुसार, न कि उसकी धारणात्मक भावना के अनुसार।

(चार) हमारे अध्यक्ष की स्पृश्यता संबंधी परिभाषा को अपनाते समय, जिसके बारे

में मुझे कहना ही पड़ेगा कि उन्होंने वह अपनी जिम्मेदारी पर ही दी।

लगता है कि प्रांतीय मताधिकार कमेटी ने खंड का उस रूप में उल्लेख

नहीं किया है ‘जिस रूप में वह संयुक्त प्रांत में विद्यमान है।’

  1. श्री ब्लंट तथा संयुक्त प्रांत की सरकार दोनों ने दलित वर्गों की संख्या के आंकलन की जो पद्धति अपनाई है, उसके बारे में एक और महत्वपूर्ण प्रश्न पैदा होता है। भारतीय मताधिकार कमेटी ने इस परिकल्पना को अपना आधार बनाया है कि वे सभी लोग जो उसके द्वारा स्वीकृत दो कसौटियों की परिधि में आते हैं, उन्हें अस्पृश्य माना ही जाएगा और विशेष प्रतिनिधित्व के लिए भी उसकी गणना उसी प्रकार की जाएगी, अपनी पड़ताल के दौरान भारतीय मताधिकार कमेटी ने देखा कि जैसी परिस्थिति भारत की है, उसमें सभी दलित वर्ग अस्पृश्य नहीं हैं और उनकी आर्थिक और शैक्षिक दशा के बावजूद सभी अस्पृश्यों को उनमें शामिल किया जाए। लगता है कि श्री ब्लंट और संयुक्त प्रांत की सरकार ने एक नितान्त अलग प्रकार का विभेद ‘अस्पृश्यों’ और ‘दलित वर्गों’ के बीच किया है। उनके अनुसार सभी दलित वर्गों के लोग अस्पृश्य हैं, लेकिन सभी अस्पृश्य दलित वर्गों की श्रेणी में नहीं आते। यह प्रचलित परिपाटी और भारतीय मताधिकार कमेटी के निष्कर्षों के नितान्त प्रतिकूल है। सवाल केवल नामकरण का नहीं है। इसके अति दूरगामी परिणाम निकलेंगे और वे प्रतिनिधित्व की मात्रा पर प्रभाव डालेंगे। संयुक्त प्रांत की सरकार और श्री ब्लंट प्रतिनिधित्व के प्रयोजन के लिए सभी अस्पृश्यों को आकलन में शामिल नहीं करते। वे केवल उन अस्पृश्यों का आंकलन करते हैं, जिन्हें दलित कहा जा सकता है। भारतीय मताधिकार कमेटी ने इस परिकल्पना को आधार माना है कि इस प्रयोजन के लिए उसके द्वारा स्वीकृत दो कसौटियों को लागू करके जब एक बार अस्पृश्यों के वर्ग का निर्धारण कर लिया जाए, तो इस प्रकार निर्धारित अस्पृश्यों के समूचे वर्ग को प्रतिनिधित्व के लिए आंकलन में शामिल किया ही जाना चाहिए और उसके लिए