1. प्रांत के क्षेत्र का पुनर्वितरण - Page 25

8 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

है या नहीं। इस मांग को रखने वाले मुसलमानों के प्रतिनिधिमंडल ने और इसका विरोध करने वाले हिन्दुओं के प्रतिनिधिमंडल ने मांग और उसके विरोध का वास्तविक उद्देश्य प्रकट न करने की भरसक कोशिश की। फिर भी, जो लोग असलियत जानते थे, उन्होंने महसूस किया होगा कि दोनों पक्षों ने अपनी - अपनी बात खुल कर नहीं बताई है। लेकिन इस उद्देश्य को स्पष्ट रूप से बताना ही चाहिए, ताकि इस पर इसके गुण - दोषों के अनुसार विचार किया जा सके। जहाँ तक मुझे जानकारी है, उसके आधार पर मैं इस उद्देश्य को स्पष्ट करना चाहता हूँ। हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच ‘सदभावपूर्ण सौहार्द’ के लिए मुस्लिम संप्रदाय के प्रतिष्ठित लोगों ने 20 मार्च, 1927 को कुछ शर्तें रखीं जिन्हें ‘दिल्ली मुस्लिम प्रस्ताव’ कहते हैं। इन प्रस्तावों के अनुसार मांग की गई कि (1) सिंध को अलग प्रांत बनाया जाए, (2) उत्तर - पश्चिमी सीमा प्रांत को अन्य प्रांतों के बराबर समझा जाए, और (3) पंजाब तथा बंगाल में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व उनकी जनसंख्या के अनुपात में हो। इन प्रस्तावों को सरकारी तौर पर देखने से ही पता चल जाता है कि इस योजना का उद्देश्य मौजूदा व्यवस्था में से यथासंभव अधिक से अधिक मुसलमान - बहुल प्रांत बनाना है। फिलहाल पंजाब और बंगाल ऐसे दो प्रांत हैं जहाँ मामूली सा मुस्लिम बहुमत है। इन प्रांतों में जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व की मांग करने का उद्देश्य मुसलमानों के सांप्रदायिक बहुमत को राजनीतिक बहुमत बनाना है, ताकि इन प्रांतों में निश्चित रूप से मुस्लिम सरकार बन सके। बिलोचिस्तान और उत्तर - पश्चिमी सीमा प्रांत में मुसलमानों का भारी बहुमत है, लेकिन वे अभी भी उत्तरदायी सरकार में शामिल नहीं हैं। नतीजा यह है कि मुस्लिम बहुमत सत्तारूढ़ बहुमत नहीं है। इन प्रस्तावों का उद्देश्य इस विसंगति को दूर करना है, ताकि वे ऐसे चार मुस्लिम - बहुल प्रांत बना सकें जहाँ मुस्लिम सरकार बनाना सुनिश्चित हो। चूँकि सिंध में मुसलमानों की प्रधानता है, अतः सिंध को अलग प्रांत बनाने की मांग करना योजना में शामिल मुस्लिम प्रांतों की सूची में पाँचवाँ प्रांत जोड़ना है। तो इन मुस्लिम प्रांतों को बनाने का उद्देश्य क्या है? खुद मुसलमानों की नज़रों में भी इसका उद्देश्य सांप्रदायिक निर्वाचक - मंडलों जैसा ही है। इस योजना को तैयार करने वालों का कहना है कि यदि मुस्लिम प्रांतों का उनका प्रस्ताव मान लिया जाए तो वे सांप्रदायिक निर्वाचक - मंडलों की मांग छोड़ने और सभी प्रांतीय विधान-मंडलों तथा केंद्रीय विधान-मंडल में संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों को मानने के लिए तैयार है। तर्क की समानता से यह निष्कर्ष निकलता है कि मुस्लिम प्रांत बनाने का उद्देश्य मुस्लिम अल्पसंख्यकों की रक्षा करना है, क्योंकि सांप्रदायिक निर्वाचक - मंडलों का भी यही उद्देश्य था। योजना को सरसरी तौर पर देखने से यह पता नहीं चलता कि जिन प्रांतों में हिन्दुओं की प्रधानता है, वहाँ बहुसंख्यक हिन्दुओं के मुकाबले में अल्पसंख्यक मुसलमानों की रक्षा करने में मुस्लिम प्रांतों की रचना कैसे सहायक होगी। ऐसा लगता है कि मुस्लिम अल्पसंख्यकों को सांप्रदायिक निर्वाचक - मंडलों से जो सुरक्षा मिलती है या मिलती प्रतीत होती है, उसे खत्म करके यह योजना वस्तुतः उनकी स्थिति कमजोर