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प्रांत के क्षेत्र का पुनर्वितरण

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कर रही है। लेकिन यदि हम योजना की गहराई से जांच करें, तो देख सकते हैं कि यह उतनी निर्दोष और बेकार नहीं है जितनी कि ऊपर से दिखाई देती है। मुस्लिम अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए यह मूलतः एक बढि़या ढाल है। यदि हिंदू प्रांतों में बहुसंख्यक हिंदू अल्पसंख्यक मुसलमानों पर अत्याचार करें, तो योजना पाँच मुस्लिम प्रांतों में बहुसंख्यक मुसलमानों को अल्पसंख्यक हिंदुओं पर अत्याचार करने का अवसर प्रदान करती है। यह ईंट का जवाब पत्थर से देने की सुरक्षा पद्धति है। आतंक के बदले आतंक और अंततः अत्याचार के बदले अत्याचार इसका मूल मंत्र है। पूरी योजना का और सिंध को अलग प्रांत बनाने का यही उद्देश्य है। यदि इस बारे में कोई शक हो तो मैं उसे नेहरू समिति की रिपोर्ट का हवाला देकर दूर करना चाहता हूँ। रिपोर्ट में कहा गया है : “हम जानते हैं कि सिंध को अलग करने की मुस्लिम मांग सर्वाधिक संतोषजनक ढंग से नहीं की गई थी। यह सांप्रदायिकता पर आधारित थी और बेमतलब ऐसे दूसरे मुद्दों से जुड़ी हुई थी, जिनसे इसका कोई सरोकार नहीं था।” नेहरू समिति सिंध के अलग होने का असली कारण बताने से कतराई। इससे यह धारण् ा बनती है कि समिति को जो कारण पता चला होगा, वह निश्चय ही प्रशंसनीय नहीं होगा। लेकिन यदि हम इससे सहमत होना चाहते हैं, तो बेहतर यही है कि हम इसके बारे में बुरी से बुरी बात भी जान लें। अतः मैं इस पर से पर्दा हटा कर मौलाना अबुल कलाम आजाद को ही यह बताने का मौका दूँगा। मुस्लिम लीग के हाल ही में कलकत्ता में हुए अधिवेशन में उन्होंने एक भाषण दिया। रूखेपन और स्पष्टता के कारण इस भाषण की प्रशंसा की जानी चाहिए। भाषण के दौरान उन्होंने कहा : “लखनऊ समझौते द्वारा उन्होंने अपने हितों को बेच डाला। गत मार्च के दिल्ली प्रस्तावों ने भारत में मुसलमानों के वास्तविक अधिकारों की मान्यता का दरवाज़ा पहली बार खोला है। 1917 के समझौते के द्वारा पृथक निर्वाचन क्षेत्रों से उन्हें केवल मुस्लिम प्रतिनिधित्व प्राप्त हुआ, लेकिन मुसलमान बिरादरी के लिए, अस्तित्व के लिए जो बात महत्वपूर्ण थी वह थी उनके संख्याबल की मान्यता। दिल्ली प्रस्तावों ने ऐसे हालात पैदा किए, जिनसे उन्हें भावी हिन्दुस्तान में उचित हिस्सा मिलने की गारंटी मिलेगी। बंगाल और पंजाब में उनका मौजूदा मामूली - सा बहुमत केवल जनसंख्या संबंधी आंकड़ा था। लेकिन दिल्ली प्रस्तावों से उन्हें पहली बार पाँच प्रांत मिले, जिनमें से कम से कम तीन प्रांतों (सिंध, उत्तर - पश्चिमी सीमा प्रांत और बिलोचिस्तान) में उनका असल में भारी बहुमत था। यदि मुसलमान इस महत्वपूर्ण कदम को नहीं समझे, तो वे जीने के काबिल नहीं थे (तालियाँ)। अब पाँच मुस्लिम प्रांतों की तुलना में नौ हिंदू प्रांत होंगे और नौ प्रांतों में हिंदू जैसा व्यवहार करेंगे वैसा ही व्यवहार पाँच प्रांतों में मुसलमान हिंदुओं के साथ करेंगे। क्या यह बड़ा फायदा नहीं था? क्या मुस्लिम अधिकारों को मनवाने के लिए एक नया हथियार हाथ नहीं लग गया था?” (‘‘हिंदुस्तान टाइम्स’’, 3 जनवरी, 1928)। कोई भी व्यक्ति जो सरल अंग्रेजी का सीधासादा अर्थ समझता है, सिंध के अलग होने की मांग के असली उद्देश्य के बारे में गलती नहीं कर सकता। स्पष्ट है कि सिंध के