1. प्रांत के क्षेत्र का पुनर्वितरण - Page 27

10 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

भाग्य से असली उद्देश्य का कोई संबंध नहीं है। यह मुस्लिम अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए तैयार की गई योजना का एक भाग है और इसका आधार यह सिद्धांत है कि शांति बनाए रखने का सबसे अच्छा तरीका युद्ध के लिए तैयार रहना है।

  1. मांग का असली उद्देश्य जानने के बाद प्रश्न यह है कि क्या हम इससे सहमत हों? कम से कम मैं तो इससे सहमत नहीं हो सकता और मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि कोई भी व्यक्ति जो अच्छा प्रशासन चाहता है, इससे सहमत नहीं होगा। नेहरू समिति ने जिस प्रकार सिंध को अलग करने के पक्ष में अपने विचार प्रकट किए हैं, उसी प्रकार यह भी कहा जाएगा कि “पेश करने के तरीके से प्रस्ताव के गुणदोष कम नहीं हो जाते।” मुझे इस रुख पर आपत्ति है। मेरा विचार है कि तरीके से प्रयोजन का पता चलता है। प्रयोजन कोई छोटी - मोटी बात नहीं है, बल्कि स्थिति का खाका बदलने के लिए काफी है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि किसी संस्था को चलाने वाली और उसकी दिशा निश्चित करने वाली ताकत का केंद्र वह प्रयोजन ही है जिसने संस्था को बनाया है। इस योजना का प्रयोजन निस्संदेह बहुत भयानक है। इसमें न्याय और शांति बनाए रखने के लिए बदले की भावना का सहारा लिया गया है। इस योजना में, दूसरे प्रांतों में उनके धर्मावलंबी साथियों द्वारा किए गए अत्याचारों या पापों के लिए निर्दोष अल्पसंख्यकों को - मुस्लिम प्रांतों में हिंदुओं और हिंदू प्रांतों में मुसलमानों को - सजा देने का मौका दिया गया है। जो पद्धति अल्पसंख्यकों को उनके अपने ही प्रांत में नागरिक के बदले बंधक समझने की अनुमति देती है, उसकी अपने आप निंदा होनी चाहिए। ये अल्पसंख्यक वे लोग हैं जिनके अधिकार उनके गलत व्यवहार के कारण नहीं जब्त किए जाते बल्कि कहीं और उनके भाई - बंधुओं ने जो गलत व्यवहार किया होगा, उसके दंडस्वरूप समाप्त किए जाते हैं। और कौन कह सकता है कि जिस शिकायत के आधार पर अधिकार जब्त किए जाते हैं वह हमेशा सही और ठोस होगी? शिकायत से आदमी अक्सर केवल दुख या तकलीफ़ महसूस करता है, जिससे अल्पसंख्यकों के खिलाफ कोई भी छोटी या बड़ी बात प्रांतों के बीच लड़ाई का कारण बन जाती है। ऐसी योजना के परिणाम इतने भयंकर हैं कि इनके बारे में धैर्य से नहीं सोचा जा सकता। हिंदू प्रांतों में हिंदुओं को मुसलमानों पर अत्याचार करने के वैसे ही अवसर मिलने से योजना अच्छी नहीं हो जाती। इसमें तो मनमुटाव और विघटन के बीज छिपे हैं। यह योजना इतनी खराब है कि यदि मुसलमान इसके बिना अपने आप को सुरक्षित नहीं महसूस कर सकते तो मैं चाहूँगा कि स्वराज को तब तक के लिए टाल देना चाहिए, जब तक कि पारस्परिक विश्वास से उन्हें यह भरोसा न हो जाए कि वे इस योजना के बिना काम चला सकते हैं। नेहरू समिति ने तर्क दिया है कि “भारत में जनसंख्या का जो वितरण आज है, उसके लिए इतिहास में हुई घटनाओं का लम्बा सिलसिला उत्तरदायी है” - और सांप्रदायिक प्रांत बनाने में, “हमें तथ्यों को केवल उनके सही रूप में समझना है।” यह बेशक सही है। लेकिन मुद्दा यह है कि ऐसे समय में जब सांप्रदायिक भावना पूरे उफान पर है राष्ट्रीय भावना अत्यधिक