परिच्छेद II
प्रांतीय कार्यपालिका
अध्याय 1
दोहरा शासन बनाम एकीकृत शासन
मेरे साथियों ने सिफारिश की है कि नई शासन प्रणाली लागू होने के बाद, पाँच वर्ष तक कानून और व्यवस्था को आरक्षित विषय रहने दिया जाए। यदि उनकी सिफारिश का केवल यही आशय होता कि थोड़ी सी प्रतीक्षा कर ली जाए और परिषद (काउंसिल) को मौका दिया जाए कि वह उस बीच अपने कामकाज को जमा सके, तो मैं अपने साथियों से असहमत न होता। लेकिन दुर्भाग्य से उनकी सिफारिश में इससे भी कुछ ज्यादा है। इसमें एक शर्त है कि, “इस अवधि के बाद कानून और व्यवस्था का विषय हस्तांतरित किया जाए या नहीं इसका निर्णय उच्च सदन और गवर्नर की सहमति से विधान परिषद पर छोड़ देना चाहिए।” मैं इस सिफारिश से सहमत नहीं हूँ, क्योंकि इसका मतलब दोहरे शासन को अनिश्चित काल तक जारी रखना है। ऐसी सिफारिश का समर्थन तभी किया जा सकता है, जब हम यह मान लें कि दोहरा शासन व्यावहारिक शासन प्रणाली है और चूंकि यह पहले भी सफल रही है, अतः भविष्य में भी सफल हो सकती है। मेरे विचार से यह कल्पना बिल्कुल तर्कसंगत नहीं है।
दोहरी शासन प्रणाली के असंतोषजनक होने के कई कारण बताए गए हैं। यह सही है कि बचाव के उपाय के रूप में जो कुछ प्रतिबंध लागू किए गए थे, उनसे सरकार के हस्तांतरित विषयों के कार्य में बाधा पड़ी है। मंत्रियों के नियंत्रण में जो विषय हस्तांतरित किए गए थे, उन सबका संबंध जन कल्याण से था, जो कानून और व्यवस्था बनाऐ रखने से संबंधित विषयों से नितांत अलग है। असल में, अधिकतर ऐसे विषय ही हस्तांतरित किए गए थे, जो इसी प्रकार के थे। अतः नीति के अनुसार प्रेसिडेंसी की वित्त व्यवस्था मंत्री के अधीन होनी चाहिए थी। क्योंकि स्पष्ट है कि जब तक वित्त विभाग किसी नीति की सफलता के लिए साधन तथा उपाय उपलब्ध न कराए, तब तक उसके सफल होने की कोई संभावना नहीं है।