प्रांतीय कार्यपालिका
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वित्त विभाग से यह आशा तभी की जा सकती है, जब उसका संबंध सरकार के मंत्रीपक्ष से हो, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वित्त विभाग के गठन और नियमन तथा कार्यों के लिए अधिनियम के अधीन नियमों द्वारा धारा 45क (3) में व्यवस्था की गई थी। इसके अनुसार गठित विभाग न तो हस्तांतरित था और न ही आरक्षित। अपितु यह समान रूप से सरकार के दोनों पक्षों के लिए था। लेकिन जैसा कि हस्तांतरण नियामावली के नियम 36(1) में कहा गया था कि वित्त विभाग पर कार्यकारी परिषद् के किसी सदस्य का नियंत्रण होना चाहिए, अतः वह विभाग वस्तुतः आरक्षित विभाग बन गया था। जो कार्यकारी पार्षद विधान-मंडल के प्रति उत्तरदायी न हों। उसके हाथों में विभाग सौंपने का स्वाभाविक परिणाम यही है कि विभाग आरक्षित रहे। ऐसे विभाग का प्रमुख प्रायः आरक्षित विभागों जैसा ही कार्य करेगा, जो मंत्रियों के लिए हानिकर होगा। हस्तांतरित विषयों के अहित का एक और कारण वे अधिकार थे, जो इस संदर्भ में गवर्नर को दिए गए थे। धारा 52(3) में कहा गया था कि जब तक असहमति का पर्याप्त कारण न हो, हस्तांतरित विषयों में गवर्नर मंत्रियों की सलाह से काम करेगा। लेकिन एक आम शिकायत यह रही है कि गवर्नर मूल मतभेदों की असाधारण स्थिति में तो हस्तक्षेप करते ही हैं, वे अन्य मामलों में भी हस्तक्षेप कम करने के बदले यह मानते हैं कि मंत्री केवल उनके सलाहकार हैं और वे उचित समझें तो उनकी सलाह को ठुकरा सकते हैं। इस गलत व्याख्या से मंत्रियों की स्थिति कार्यकारी पार्षदों की स्थिति से भी बदतर हो गई। कार्यकारी पार्षदों की राय को सामान्य मामलों में बहुमत के अतिरिक्त रद्द नहीं किया जा सकता था। इसके विपरीत धारा 52(3) की गवर्नरों द्वारा की गई व्याख्या के अनुसार मंत्री गवर्नर की कृपा पर निर्भर थे और उन्हें वह सुरक्षा प्राप्त नहीं थी, जो कार्यकारी पार्षदों को प्राप्त थी। मंत्रियों की गतिविधियों को पंगु करने और उनके मुकाबले गवर्नरों की शक्ति को बढ़ाने में एक और बात सहायक हुई। गवर्नर को दिए गए अनुदेश पत्र में उसे प्रेसिडेंसी में सेवारत सेवाओं के सब सदस्यों के हितों की रक्षा का भार सौंपा गया था, ताकि वे वैध तरीकों से अपना कर्तव्य पूरा कर सकें और अपने सब मान्यताप्राप्त अधिकारों तथा विशेषाधिकारों का उपयोग कर सकें। यह कर्त्तव्य केवल सेवाओं के हितों की रक्षा करने तक सीमित था। लेकिन गवर्नरों ने इन हिदायतों की और विशद व्याख्या करके इस इस बात पर जोर दिया कि सेवा - संबंधी सब मामले, जिनमें मंत्रियों के विभागों में उनकी नियुक्ति, तैनाती और तरक्की भी शामिल है, गवर्नरों के अधीन होने चाहिएं। बंबई में तो गवर्नर ने कार्यकारी पार्षदों के अधीन काम कर रहे सेवाओं के सदस्यों के बारे में भी इस अधिकार का दावा किया। यह जताने के लिए कि गवर्नर को यह अधिकार प्राप्त हैं, “नियुक्त करते हुए गवर्नर इन काउंसिल को प्रसन्नता है” के सामान्य रूप को बदल कर “नियुक्त करते हुए गवर्नर को प्रसन्नता है” लिखा जाने लगा। मंत्री के