14 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
विभाग के सचिव की स्थिति ने भी मंत्री के अधिकार को कम करने और गवर्नर की निरंकुशता को बढ़ाने में सहायता की, क्योंकि जिन मामलों में सचिव का मंत्रियों के निर्णय से मतभेद होता था, उन सब मामलों में वह अपने राजनीतिक प्रमुख को लांघकर सीधे ही गवर्नर की आज्ञा से निर्णय बदलवा सकता था।
निश्चय ही इन सब बातों का दोहरी शासन प्रणाली के संतोषजनक कार्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। अक्सर यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि यदि ये कारण न होते तो दोहरा शासन व्यावहारिक शासन प्रणाली हो सकती थी और मैं इसी बात के प्रति सचेत करना चाहता हूँ। मेरा विचार है कि दोहरी शासन प्रणाली अपने आप में अव्यावहारिक शासन प्रणाली है। सौभाग्य से यह राय मेरी अकेले की हीं नहीं है। बंबई सरकार के कुछ सदस्य दोहरी शासन प्रणाली को जारी रखने का व्यक्तिगत रूप से समर्थन करते हैं। लेकिन बंबई सरकार ने 1919 में ही इसे अव्यावहारिक बता कर निकम्मा ठहरा दिया था और इसके शब्द उद्धहरण योग्य हैंः “सरकारी रिकार्ड को देखने से पता चलेगा कि सरकारी विभागों में शायद ही कोई ऐसा महत्वपूर्ण प्रश्न चर्चा और निपटान के लिए आया हो, जिस पर दूसरे विभाग के अधिकार क्षेत्र के विचार से सावधानीपूर्वक जाँच करने की आवश्यकता न हो। समग्रतः सरकार का पहला कर्तव्य शांति और व्यवस्था बनाए रखना, शक्तिशाली से कमजोर की रक्षा करना और यह देखना है कि सभी समस्याओं के समाधान में प्रभावित अनेक विभिन्न वर्गों के परस्पर विरोधी हितों पर उचित ध्यान दिया जाए। इसका मतलब यह हुआ कि यदि किसी विभाग का प्रभारी मंत्री जो भी महत्वपूर्ण प्रस्ताव पेश करे, तो प्रायः वे सब के सब आरक्षित विभागों के प्रभारी अधिकारियों के पास भेजे जाऐंगे, क्योंकि शायद ही कोई ऐसा विषय हो, जो सरकार के दोनों भागों के अंतर्गत न आता हो। अतः मंत्री के अधीन किसी हस्तांतरित विषय से संबंधित मामले को आरक्षित विषयों वाले विभाग के पास भेजे बिना ही निपटाने का सिद्धांत निराधार है।”
विषयों के विभाजन के कारण होने वाला दोहरापन ऐसा स्वाभाविक दोष है, जो दोहरे शासन को व्यावहारिक बनाता है। एक दोष और भी है। कार्यपालिका के लिए सामान्य नीति के अनुसार एकजुट होकर काम करना संभव नहीं है। सामान्य शासनादेश से पैदा होने वाली सामान्य निष्ठा से ही ऐसी एकजुटता आ सकती है। मंत्री विधान-मंडल के सदस्यों में से नियुक्त किए जाते हैं। अतः वे इसके प्रति दायित्व समझने के लिए बाध्य हैं। उन्हें इसीलिए नियुक्त किया जाता है और यदि वे अपना दायित्व समझें, तो अभीष्ट योजना पूरी नहीं होती। विधानमंडल से जोड़ने वाली प्रत्येक कड़ी उन्हें उनके सरकारी साथियों से अलग - थलग ही करती है और नतीजा यह होता