2. प्रांतीय कार्यपालिका - Page 32

प्रांतीय कार्यपालिका

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है कि दोहरे शासन में निहित दोहरापन उभरकर सामने आ जाता है। जब यह दोहरापन सरकार के दोनों आधे - अधूरे भागों में जड़ जमा लेता है, तो सरकार चलाना असंभव हो जाता है। मंत्रियों और कार्यकारी पार्षदों द्वारा परिषद् में भाषणों और वोट से एक - दूसरे का विरोध करने के अनेकों उदाहरणों से यह संभावना सिद्ध हो जाती है। दोहरे शासन में इस दोहरेपन पर मिलीजुली सरकार से नियंत्रण रखा जाता है। मिलीजुली सरकार पूर्णतः अलग - अलग शासनादेश वाले दो दलों के बीच थोपा गया और बनावटी मेल है, जिससे आसानी से गतिरोध पैदा हो सकता है। बंबई प्रेसिडेंसी में ऐसा गतिरोध नहीं हुआ है। इसका मतलब यह नहीं है कि दोहरे शासन में यह दोष निहित नहीं है। इससे साफ - साफ पता चलता है कि इस मिलीजुली सरकार में मंत्री पार्षदों के आगे झुक गए थे।

  1. इन निहित दोषों के होते हुए भी, कुछ लोगों की राय है कि इस प्रेसिडेंसी में दोहरा शासन सफल रहा है। इस राय को तभी माना जा सकता है, जब इसका मतलब यह हो कि गवर्नर संविधान को निलंबित करने या भारत सरकार अधिनियम द्वारा प्रदत्त आपातकालीन शक्तियों का प्रयोग करने के लिए बाध्य नहीं था, यह सही है। लेकिर प्रश्न यह नहीं है कि दोहरा शासन चला नहीं। प्रश्न यह है कि क्या दोहरा शासन उत्तरदायी शासन के रूप में चला, क्योंकि इस बात की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि 1919 में अन्य अनेक ऐसी वैकल्पिक शासन प्रणालियाँ थीं, जो स्वीकृति के लिए दोहरे शासन से होड़ कर रही थीं। कांग्रेस लीग योजना थी और प्रांतों के प्रमुखों की योजना थी। औरों का उल्लेख करने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन दोहरे शासन को तरजीह देकर इन सब शासन प्रणालियों को अस्वीकार कर दिया गया था, क्योंकि ये उत्तरदायी शासन की कसौटी पर खरी नहीं पाई गईं। अतः दोहरी शासन प्रणाली के मूल्यांकन का आधार केवल यही श्रेष्ठ कसौटी होनी चाहिए। यदि हम इस तथ्य को ध्यान में रखकर दोहरे शासन प्रणाली का मूल्यांकन करने की कोशिश करें, तो निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि इस प्रांत में दोहरा शासन असफल रहा है। उत्तरदायी शासन का अर्थ है कि कार्यपालिका तभी तक अपने पद पर बनी रह सकती है, जब तक उसे सदन में बहुमत प्राप्त हो। यही मंत्री वर्गीय उत्तरदायित्व के सिद्धांत का सार है। अब यदि हम बंबई प्रेसिडेंसी में दोहरे शासन के कार्य को इस कसौटी पर कसें और हस्तांतरित विषयों से संबंधित प्रस्तावों पर जितनी बार परिषद् में विभाजन हुआ है, उस पर विचार करें, तो एक अजीब तमाशा दिखाई देता है। वह यह है कि सदन में बार - बार मंत्रियों की पराजय हुई है और फिर भी वे अपने पदों पर बने रहे हैं। जैसे कुछ हुआ ही न हो। यह शोचनीय स्थिति निम्नलिखित सारणी में दिखाई गई है।