16 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
वर्ष विभाजनों विभाजन सरकार यदि सरकारी सरकार दोनों पक्षों
की कुल जिनमें की गुट को निकाल की की बराबरी
संख्या सरकार पराजय दें तो सरकार की विजय की संख्या
तटस्थ रही की संख्या पराजय की संख्या की संख्या
1921 3 - 2 2 1 - 1922 17 - 4 8 9 - 1923 4 1 1 2 1 - 1924 19 - 10 14 5 1 1925 30 1 - 11 18 - 1926 3 - - 1 2 1 1927 26 - 3 10 16 - 1928 2 - 1 1 1 -
आंकड़ों से पता चलता है कि 1921 में तीन विभाजनों में से दो में मंत्रियों की हार हुई। 1922 में 17 में से 8 में, 1924 में 19 में से 14 में, 1925 में 30 में से 11 में, 1926 में 3 में से 1 में, 1927 में 26 में से 10 में और 1928 में 2 में से 1 में हार हुई। इस सब के होते हुए भी, इस प्रेसिडेंसी में एक बार भी किसी मंत्री ने त्यागपत्र नहीं दिया। इन तथ्यों को देखते हुए ऐसे किसी भी निष्कर्ष से सहमत होना असंभव है जिसका आशय हो कि दोहरा शासन उत्तरदायी शासन प्रणाली के रूप में चला है।
- निश्चय ही इस बारे में आपत्ति की जा सकती है कि यदि मंत्रियों ने त्यागपत्र नहीं दिया, तो इसका कारण यह है कि इन विभाजनों का उद्देश्य परिषद् द्वारा उनके प्रति अविश्वास प्रकट करना नहीं था। यदि ऐसा होता तो परिषद् उन मंत्रियों को धन देने से मना कर देती जिनके प्रति इसने अविश्वास प्रकट किया था। बंबई विधान परिषद् इतनी कमजोर थी कि वह मंत्रियों पर प्रभावी ढंग से अपनी राय भी नहीं थोप सकती थी। यह एक सर्वविदित तथ्य है, जिसे बताने की जरूरत नहीं है। वह विभिन्न धड़ों व गुटों में बंटी हुई थी और वह सिद्धातों के बदले व्यक्तियों का अनुकरण करती थी। उसके इस आत्मघाती तरीके ने इसे कार्यपालिका के हाथों का खिलौना बना दिया। स्थिति इतनी खराब थी कि समूचा सदन अपने उस विशिष्ट दायित्व का निर्वाह नहीं कर सका, जिसकी अपेक्षा अपने अधिकार के प्रति सजग किसी निर्वाचित सदन से की जाती है। कोई भी निर्वाचित सदन, चाहे उस पर कार्यपालिका का कितना ही कठोर अंकुश क्यों न हो, पद के लिए सदन के किसी सदस्य की उम्मीदवारी को तभी स्वीकार करेगा, जब वह इस बात का परिचय दे दे कि उसके भीतर भाषण की कुछ क्षमता है, किसी विषय के निपटारे के लिए उसके पास कुछ कौशल है, उसके पास कुछ हाजिरजवाबी है और इन सबसे बढ़कर कुछ ऐसी ठोस दूरदर्शिता है, जो आर्थिक तथा सामाजिक खुशहाली की तर्कसंगत नीति की नींव