2. प्रांतीय कार्यपालिका - Page 35

18 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

मार्गदर्शन करेगा और यथासंभव उनकी सलाह को स्वीकार करेगा तथा उनकी नीति को बढ़ावा देगा। इस कथन का कोई औचित्य नहीं है कि समिति चाहती थी कि वह संवैधानिक प्रमुख की भूमिका निभाए। वस्तुतः ऐसा आशय अधिनियम के उपबंधों के विरुद्ध होगा, क्योंकि इन उपबंधों के अनुसार गवर्नर की तानाशाही शक्तियाँ जानबूझकर आरक्षित की गई थीं। संयुक्त रिपोर्ट या संसदीय समिति की रिपोर्ट उनके प्रयोग को रद्द नहीं करती। इस प्रकार, यदि गवर्नर ने स्वयं शासन किया है और अपने माध्यम से मंत्रियों को शासन नहीं करने दिया है, तो इसमें उसका कोई दोष नहीं है। लेकिन यदि यह मान लिया जाए कि गवर्नर को संवैधानिक प्रमुख के रूप में कार्य करना चाहिए था, तो पुनः सवाल उठता है कि क्या इससे दोहरी शासन प्रणाली उत्तरदायी शासन हो सकती थी? इस सवाल का भी मेरा जवाब है ‘नहीं’। क्योंकि मैं जो स्थिति समझता हूँ उसके अनुसार यदि आप गवर्नर की शक्ति छीन लें और उसे संवैधानिक प्रमुख बना दें, तो आप शासन के आरक्षित पक्ष के अस्तित्व को जनता द्वारा निर्वाचित सदन के आक्रमण के लिए छोड़ देते हैं। गवर्नर की सुरक्षा से वंचित आरक्षित पक्ष के पास इस संकट से बचने का केवल एक ही उपाय है और वह है परिषद् की इच्छानुसार शासन के लिए सहमत होना। दूसरे शब्दों में, यदि आप उन्हें गवर्नर की पहुँच से दूर कर दें, तो उन्हें हस्तांतरित पक्ष के बराबर रखने के अतिरिक्त आपके पास कोई और विकलप नहीं है। इसे दूसरे ढंग से हम ऐसे कह सकते हैं कि यदि आपकी इच्छा गवर्नर की हैसियत घटाकर संवैधानिक प्रमुख बनाने की है, तो पहले दोहरे शासन का अंत करना चाहिए।

  1. अभी तक मैंने इस दृष्टिकोण का विरोध किया है कि दोहरी शासन प्रणाली ऐसी नहीं है कि उसे कुछ अन्य कारणों ने अव्यावहारिक बना दिया है। साथ ही मैंने इस दृष्टिकोण का समर्थन किया है कि यह शासन प्रणाली अपने निहित दोषों के कारण न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि उत्तरदायी शासन के रूप में चलने में भी असमर्थ है। इसमें कोई शक नहीं कि पूर्ण दोहरेपन वाला दोहरा शासन, जिसमें दो अलग - अलग शासन और दो अलग - अलग विधायिकाएँ हों, उस आलोचना से मुक्त है, जो प्रचलित दोहरे शासन वाले दोहरेपन के संदर्भ में की जाती हैं एक में विधायिका कार्यपालिका के अधीन है और दूसरे में कार्यपालिका विधायिका के अधीन। लेकिन दोहरे शासन वाले दोहरेपन का विकल्प भारत शासन ने 1919 में अस्वीकार कर दिया था। इसके बारे में भी वही आपत्ति की जाती है, जो मार्ले - मिन्टो सुधारों द्वारा स्थापित शासन प्रणाली के बारे में की जाती है। मांटेग्यू - चेम्सफोर्ड रिपोर्ट में जितने जोरदार ढंग से यह आपत्ति की गई है, उतनी कभी नहीं की गई है। भारत में राजनीतिक जीवन के उदय के समय ऐसी प्रणाली को दुबारा अपनाने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। अतः मैं ऐसी प्रणाली का सहारा लेने के बारे में कुछ नहीं कहना चाहता। दोहरे शासन को खत्म करके सारे विषय मंत्रियों को सौंपना ही एकमात्र विकल्प बचा है।

  2. अभी तक मैंने अपने उन साथियों की सिफारिशों के विरोध के सामान्य कारण बताए हैं, जिन्होंने दोहरे शासन को चालू रखने की स्वीकृति दी है। अब मैं विशेष मुद्दे